पिछले साल की बात है। मैं अपने गाँव गया था, तो गली के कोने पर बुजुर्गों की एक मंडली बैठी थी। कोई तानपुरा बजा रहा था, कोई झाँझ से साथ दे रहा था। और बीच में एक 80 साल के दादा गा रहे थे — "हेली ए! सुरत मेरी पीव से लगी..."
वो आवाज़ अभी भी कानों में गूँजती है। गाते-गाते दादा की आँखें बंद हो गईं। गला काँपा, लेकिन ताल नहीं टूटी। आस-पास बैठे लोगों की भी आँखें नम हो गईं। कोई रुमाल निकाल रहा था, कोई बस सिर झुकाए बैठा था।
उस दिन मुझे समझ आया कि भजन सिर्फ गाने नहीं होते। वो एक जीवंत अनुभव हैं, एक जीवन-शैली। और यही बात संत उमाराम जी महाराज ने अपने इस भजन में कही है।
भजन पाठ
हेली ए! सुरत मेरी पीव से लगी, सतगुरु दिया लखाय।
मेरा पीव सकल का साहब, सब पर रखे महर।
सब की जाण उन्हीं ते चाले, रहता आपहि ठहर॥
वो साहब सारों में शामिल, सब ही में रहे गहर।
है सब माहिं रहे निर आसे, आप अनामी अलहद॥
वो प्रीतम मेरे को दरस्या, मिट्या हमारा जहेर।
निज सुख रूप सदा एक सारा, लीया सुरता हेर॥
वा प्रीतम की खबर न जिनको, मिटे नहीं दुःख लहेर।
और खबर ते काज न सीझे, अगम निगम कह टेर॥
कोटिक भाण रोम की शोभा, तां नहीं साँईं सवेर।
अकथ उजाला कहा न जावे, कोई कह सके न फेर॥
सच्चिदानन्द केवल करतारा, सभर भर्या चौंफेर।
"उमाराम" प्रीतम की सेना, लखे संत कोई शेर॥
Bhajan in Hinglish
Heli e! Surat meri peev se lagi, Satguru diya lakhay।
Mera peev sakal ka Sahib, sab par rakhe mehar।
Sab ki jaan unheen te chaale, rahta aapahi thahar॥
Vo Sahib saaron mein shaamil, sab hi mein rahe gahar।
Hai sab maahin rahe niraase, aap anaami alahad॥
Vo preetam mere ko darasya, mitya hamara jahar।
Nij sukh roop sada ek saara, leeya surata her॥
Va preetam ki khabar na jinko, mite nahin dukh laher।
Aur khabar te kaaj na seejhe, Agam Nigam kah ter॥
Kotik bhaan rom ki shobha, taan nahin Saain saver।
Akath ujaala kaha na jaave, koi kah sake na pher॥
Sachchidanand keval Kartara, sabhar bharya chaunpher।
"Umaram" preetam ki sena, lakhe sant koi sher॥
संत उमाराम जी महाराज कौन थे?
संत उमाराम जी महाराज राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित निर्गुण संत, कवि और आध्यात्मिक मार्गदर्शक माने जाते हैं। उनकी वाणी में गुरु-भक्ति, आत्मचिंतन, सत्संग और परमात्मा के प्रति प्रेम का अत्यंत सुंदर समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने सरल लोकभाषा में ऐसे भजनों और सत्संग वचनों की रचना की, जो सीधे सामान्य जनमानस के हृदय तक पहुँचते हैं। उनकी शिक्षाओं का मूल संदेश यह है कि सच्चा सुख बाहरी संसार में नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन में निहित है। आज भी राजस्थान के अनेक गाँवों और सत्संग मंडलों में उनकी वाणी श्रद्धा के साथ गाई और सुनी जाती है। उनकी रचनाएँ केवल भक्ति का मार्ग नहीं दिखातीं, बल्कि जीवन को सरलता, विनम्रता और आध्यात्मिक जागरूकता के साथ जीने की प्रेरणा भी देती हैं।
संत उमाराम जी की वाणी का सबसे बड़ा गुण उसकी अनुभूतिपरकता है। उनके शब्द केवल दार्शनिक विचार नहीं प्रस्तुत करते, बल्कि साधना और आत्मानुभूति से उपजे हुए अनुभवों को व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ आज भी श्रोताओं के हृदय को स्पर्श करती हैं। उन्होंने निर्गुण भक्ति की परंपरा को आगे बढ़ाया। उनके भजनों में गुरु की महिमा, सत्संग का प्रभाव, और परमात्मा के प्रति प्रेम की अनुभूति इतनी जीवंत है कि सुनते ही मन भाव-विभोर हो जाता है।
भजन का हिंदी रूप
हेलौ ए! सुरत मेरी पीव से लगी, सतगुरु दिया लखाय।
(हेलो! मेरी चेतना मेरे प्रियतम से मिल गई, सतगुरु ने इसे दिखला दिया।)
मेरा पीव सकल का साहब, सब पर रखे महर।
(मेरा प्रियतम सबका मालिक है, सब पर कृपा रखता है।)
सब की जाण उन्हीं ते चाले, रहता आपहि ठहर॥
(सबकी जान उसी से चलती है, वह स्वयं अचल और स्थिर रहता है।)
वो साहब सारों में शामिल, सब ही में रहे गहर।
(वह मालिक सबमें समाया हुआ है, सबमें गहराई से विद्यमान है।)
है सब माहिं रहे निर आसे, आप अनामी अलहर॥
(सबमें रहता है बिना किसी आस के, स्वयं अनामी और स्वतंत्र।)
वो प्रीतम मेरे को दरस्या, मिट्या हमारा जहेर।
(उस प्रियतम ने मुझे दर्शन दिए, मेरा सारा विष (दुःख) मिट गया।)
निज सुख रूप सदा एक सारा, लीया सुरता हेर॥
(वह स्वयं सुख का स्वरूप है, सदा एक ही है — मेरी चेतना ने इसे देख लिया।)
वा प्रीतम की खबर न जिनको, मिटे नहीं दुःख लहेर।
(जिन्हें उस प्रियतम की खबर नहीं, उनकी दुःख की लहरें कभी नहीं मिटतीं।)
और खबर ते काज न सीझे, अगम निगम कह टेर॥
(दूसरी कोई खबर काम की नहीं, वेद-शास्त्र भी यही पुकारते हैं।)
कोटिक भाण रोम की शोभा, तां नहीं साँईं सवेर।
(करोड़ों भाषाओं और रोम-रोम की शोभा से भी वो साईं नहीं समझा जा सकता।)
अकथ उजाला कहा न जावे, कोई कह सके न फेर॥
(वो अकथ प्रकाश है, जिसे कहा नहीं जा सकता, कोई उसे बदल नहीं सकता।)
सच्चिदानन्द केवल करतारा, सभर भर्या चौंफेर।
(सच्चिदानंद स्वरूप कर्ता ही सब कुछ है, चारों ओर भरा हुआ है।)
"उमाराम" प्रीतम की सेना, लखे संत कोई शेर॥
(उमाराम कहते हैं — प्रीतम की सेना में शामिल हो, संत ही इसे समझते हैं।)
भजन का भावार्थ — गहराई में उतरना
"हेलौ ए!" राजस्थानी संत परंपरा का एक भावपूर्ण उद्गार है। यह केवल संबोधन नहीं, बल्कि आत्मा के आनंद, विस्मय और परम मिलन की घोषणा है।
सुरत और पीव का मिलन
संत उमाराम जी ने इस भजन की शुरुआत में ही सबसे गूढ़ रहस्य बता दिया। "सुरत मेरी पीव से लगी" — यहाँ सुरत का अर्थ है आंतरिक चेतना, वो ध्यान जो बाहर भटकती रहती है। और पीव है परमात्मा, परम प्रियतम। जब ये दोनों मिलते हैं, तो जीवन का सार्थक मिलन होता है।
मेरे पिताजी एक बार बता रहे थे — बाहर की दुनिया में हम कितनों से मिलते हैं, पर असली मिलन तो अपने आप से होता है। जब चेतना भटकना छोड़कर अंतर्मुखी होती है, तभी वो अपने स्रोत से जुड़ती है। यही "सतगुरु दिया लखाय" है — गुरु ने ये रास्ता दिखाया।
वो सबमें है, फिर भी निराला
भजन की अगली पंक्तियाँ बहुत सुंदर हैं। "वो साहब सारों में शामिल, सब ही में रहे गहर" — यहाँ संत जी निर्गुण और सगुण का भेद मिटा देते हैं। परमात्मा सबमें है, हर जीव में, हर कण में। लेकिन फिर भी वो "अनामी" है — नाम से परे, रूप से परे।
प्रकृति को ध्यान से देखने पर इस भाव को सहज रूप से समझा जा सकता है। वृक्ष, पक्षी, जल, वायु और समस्त जीवन में एक ही चेतना कार्य करती दिखाई देती है। संत उमाराम जी इसी सार्वभौमिक उपस्थिति की ओर संकेत करते हैं।
जहेर का मिटना — अंदर का सफ़र
"मिट्या हमारा जहेर" — ये पंक्ति पढ़ते ही एक अजीब सी शांति मिलती है। यहाँ जहेर का अर्थ है अज्ञान, अहंकार, काम-क्रोध-लोभ की विषैली लहरें। जब प्रीतम के दर्शन होते हैं, ये सब अपने आप मिट जाता है।
संतमत में "जहेर" का अर्थ बाहरी विष नहीं, बल्कि भीतर जमा अज्ञान, अहंकार, ईर्ष्या और मोह से है। जब साधक का मन परमात्मा की ओर मुड़ता है, तो ये विषैले संस्कार धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगते हैं। और जैसा कि भजन में कहा गया — "वा प्रीतम की खबर न जिनको, मिटे नहीं दुःख लहेर" — जिन्हें इस प्रीतम की खबर नहीं, वो सदा दुःख में डूबे रहते हैं।
अकथ उजाला — जो शब्दों से परे है
"अकथ उजाला कहा न जावे" — ये संतमत की सबसे गहरी बात है। वो प्रकाश जो आत्मज्ञान में प्रकट होता है, उसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। कोई कविता, कोई भाषण, कोई लेख — कुछ भी उसे पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकता।
मैंने एक बार पूछा था पिताजी से — "ये अनुभव कैसा होता है?" उन्होंने मुस्कुराकर कहा — "जैसे आँखों से रंग देखा जा सकता है, लेकिन अंधे को समझाया नहीं जा सकता। जब तक खुद नहीं देखोगे, पता नहीं चलेगा।"
इस भजन से क्या शिक्षा मिलती है?
गुरु की महिमा
भजन की पहली पंक्ति में ही गुरु का स्मरण है — "सतगुरु दिया लखाय"। बिना गुरु के ये रास्ता नहीं मिलता। संत परंपरा में गुरु को केवल शिक्षक नहीं, बल्कि दिव्य प्रकाश का स्रोत माना गया है। गुरु वो दीया है जो अंधेरे घर में रोशनी लाता है।
निर्गुण भक्ति का मार्ग
उमाराम जी का यह भजन शुद्ध निर्गुण भक्ति का उदाहरण है। कोई मूर्ति नहीं, कोई मंदिर नहीं — केवल चेतना और परमात्मा का साक्षात्कार। यही राजस्थानी संत परंपरा की विशेषता है — कबीर, दादू, सुंदरदास, मीराबाई — सबने इसी मार्ग को अपनाया।
सबमें एक देखना
"सब ही में रहे गहर" — ये वसुदैव कुटुम्बकम की भावना है। जब हम सबमें उसी एक को देखने लगते हैं, तो ईर्ष्या, द्वेष, घृणा — ये सब अपने आप मिट जाते हैं। यही सच्चा धर्म है।
अहंकार का त्याग
"मिट्या हमारा जहेर" — यहाँ "हमारा" शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। संत अपने अहंकार को पहचानते हैं और उसे मिटाते हैं। जब तक "मैं" है, "मेरा" है — तब तक दुःख है। जब ये "मैं" मिटता है, तभी सच्चा आनंद आता है।
भजन का गूढ़ संदेश
संत उमाराम जी महाराज का यह भजन एक आमंत्रण है — आमंत्रण अंतर्मुखी होने का, अपने स्रोत से जुड़ने का। आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम बाहर की दुनिया में इतना खो गए हैं कि अपने आप को ही भूल गए हैं।
ये भजन याद दिलाता है कि सच्चा सुख बाहर नहीं, अंदर है। सच्चा प्रेम बाहर नहीं, अपने परम प्रियतम में है। और ये मिलन संभव है — बस एक सच्चे गुरु की कृपा और अपनी सच्ची लगन से।
"उमाराम प्रीतम की सेना, लखे संत कोई शेर" — संत जी अंत में कहते हैं कि ये बात केवल संत ही समझ सकते हैं। ये कोई किताबी ज्ञान नहीं, ये अनुभव की बात है। जो इस सेना में शामिल हो गया, जो इस प्रीतम के प्रेम में डूब गया — उसी को ये रहस्य समझ आता है।
अंतिम विचार
कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि 200 साल पहले लिखा गया एक भजन, आज भी क्यों इतना जीवंत लगता है? शायद इसलिए कि ये शब्द नहीं, अनुभव हैं। संत उमाराम जी ने जो जिया, वो लिखा। और जो अनुभव से लिखा जाता है, वो सदियों तक जीवित रहता है।
उस शाम की याद फिर से आ रही है — दादा की काँपती आवाज़, तानपुरे की धुन, झाँझ की झनक, और वो सब लोग जो सिर झुकाए बैठे थे। उस क्षण वहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप में उस आध्यात्मिक भाव को अनुभव कर रहा था, जिसे संत उमाराम जी "अकथ उजाला" कहते हैं।
संत उमाराम जी की वाणी में यही तो खासियत है — शब्द पढ़ते हो, लेकिन अनुभव कुछ और ही होता है। हेलौ ए! — ये हेलो सिर्फ अभिवादन नहीं, एक जागृति की पुकार है। जागो, और देखो — तुम्हारी सुरत तुम्हारे पीव से मिली हुई है, बस तुम्हें देखना है।
भजन में प्रयुक्त प्रमुख आध्यात्मिक शब्दों का अर्थ
सुरत — चेतना, ध्यान या आत्मिक जागरूकता।
पीव — परमात्मा, प्रियतम, आत्मा का वास्तविक स्रोत।
अनामी — जो नाम और रूप से परे हो।
अलहर — स्वच्छंद, स्वतंत्र, किसी बंधन में न रहने वाला।
जहेर — अज्ञान, अहंकार और सांसारिक विकारों का विष।
सच्चिदानन्द — सत्य, चेतना और आनंद का परम स्वरूप।
अकथ उजाला — वह दिव्य अनुभूति जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
जय गुरुदेव। जय संतमत।
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