गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु महेश्वर गुरु परब्रह्म अपार | संत अचलराम जी भजन अर्थ और संतमत विचार

            कभी-कभी कोई भजन केवल गाया नहीं जाता, बल्कि भीतर उतरकर साधक को उसकी अपनी यात्रा का स्मरण करा देता है। संत अचलराम जी का यह भजन भी ऐसा ही है। पहली दृष्टि में यह गुरु-महिमा का भजन प्रतीत होता है, लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो इसमें संतमत की पूरी साधना छिपी हुई है। यहाँ गुरु केवल पूजनीय व्यक्ति नहीं हैं; वे वही शक्ति हैं जो सोई हुई सुरत को जगाती है, उसे संसार के बंधनों से निकालती है और उसके वास्तविक घर तक पहुँचाती है। इसलिए इस भजन में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की चर्चा केवल पौराणिक कथा नहीं, बल्कि साधक के भीतर घटने वाली आध्यात्मिक प्रक्रिया का संकेत है।
प्रणाम गुरुदेवजी को बारम्बार भजन का संतमत दृष्टि से गहन अर्थ। गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु महेश्वर और गुरु परब्रह्म की आध्यात्मिक व्याख्या पढ़ें।


भजन पाठ 

प्रणाम गुरुदेवजी को बारम्बार॥

गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु महेश्वर, गुरु परब्रह्म अपार॥

एक ही परब्रह्म रूप चतुर धर, लीला करत विहार॥

ब्रह्मा रूप हो वेद प्रकट कर, रचे सकल संसार॥

विष्णु रूप हो विश्व को पालत, धर्म हेतु ले अवतार॥

रुद्र रूप धर दुष्ट रुलावत, प्रलय करे संहार॥

"अचलराम" मुमुक्षुओं के कारण, गुरु मूर्ति ले धार॥

Bhajan Path (Hinglish)

Pranaam Gurudevji ko baarambaar॥

Guru Brahma Guru Vishnu Maheshwar, Guru Parabrahm apaar॥

Ek hi Parabrahm roop chatur dhar, leela karat vihaar॥
Brahma roop ho Ved prakat kar, rache sakal sansaar॥

Vishnu roop ho vishva ko paalat, dharm hetu le avataar॥
Rudra roop dhar dusht rulaavat, pralay kare sanhaar॥

"Achalram" mumukshuon ke kaaran, Guru moorti le dhaar॥

प्रणाम की वास्तविकता

"प्रणाम गुरुदेवजी को बारम्बार॥"

सामान्य रूप से प्रणाम का अर्थ हाथ जोड़ना या सिर झुकाना समझा जाता है। लेकिन संतमत में प्रणाम इससे कहीं अधिक गहरा है। शरीर का झुकना आसान है, मन का झुकना कठिन है और अहंकार का झुकना सबसे कठिन।
बहुत बार ऐसा होता है कि हम गुरु के चरणों में सिर तो रख देते हैं, लेकिन अपने विचार, अपनी मान्यताएँ और अपनी जिद नहीं छोड़ते। बाहर प्रणाम हो जाता है, भीतर नहीं।
संतों की दृष्टि में सच्चा प्रणाम तब होता है जब सुरत अपनी अलग सत्ता का अभिमान छोड़कर शब्द की ओर मुड़ती है। उस क्षण केवल शरीर नहीं झुकता, "मैं" भी झुकता है।
"बारम्बार" शब्द भी ध्यान देने योग्य है। इसका अर्थ केवल बार-बार नमस्कार करना नहीं है। इसका अर्थ है — जीवन के प्रत्येक अनुभव में, प्रत्येक परिस्थिति में, बार-बार अपने अहंकार को पहचानना और उसे गुरु चरणों में समर्पित करते रहना।

गुरु त्रिमूर्ति नहीं, त्रिमूर्ति का मूल

"गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु महेश्वर, गुरु परब्रह्म अपार॥"

यहाँ गुरु की तुलना केवल ब्रह्मा, विष्णु और महेश से नहीं की गई, बल्कि उनसे भी आगे "परब्रह्म" कहा गया है।
संतमत में इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु कोई पौराणिक देवता हैं। इसका अर्थ है कि साधक की आध्यात्मिक यात्रा में जो कार्य ब्रह्मा, विष्णु और महेश करते हैं, वह सब गुरु के माध्यम से घटित होता है।
गुरु ब्रह्मा हैं क्योंकि वे सोई हुई चेतना को जगाते हैं।
गुरु विष्णु हैं क्योंकि वे जागी हुई चेतना का पालन करते हैं।
गुरु महेश हैं क्योंकि वे अज्ञान और अहंकार का संहार करते हैं।
और गुरु परब्रह्म हैं क्योंकि वे स्वयं उसी सत्य में स्थित हैं जहाँ से यह सब कार्य उत्पन्न होते हैं।
"अपार" का अर्थ केवल महान नहीं, बल्कि असीम है। गुरु का बाहरी व्यक्तित्व सीमित दिखाई दे सकता है, लेकिन जिस चेतना में वे स्थित हैं, उसकी कोई सीमा नहीं।

एक ही परब्रह्म

"एक ही परब्रह्म रूप चतुर धर, लीला करत विहार॥"
यह पंक्ति केवल दर्शन नहीं, अनुभव का विषय है।
जब तक मन बाहर की दुनिया में उलझा रहता है, तब तक उसे अनेकता दिखाई देती है। कोई ब्रह्मा लगता है, कोई विष्णु, कोई शिव और कोई गुरु।
लेकिन जब साधक की सुरत भीतर लौटने लगती है, तब धीरे-धीरे उसे अनुभव होता है कि विविधता के पीछे एक ही सत्ता कार्य कर रही है।
संतों ने अद्वैत को तर्क से नहीं, अनुभव से जाना है।
यही कारण है कि वे कहते हैं — एक ही परब्रह्म अनेक रूपों में अपनी लीला कर रहा है।
"लीला" शब्द बहुत सुंदर है। इसमें कोई बोझ नहीं, कोई बाध्यता नहीं। परम सत्ता कुछ पाने के लिए नहीं कर रही, वह अपने स्वभाव से प्रकट हो रही है।

ब्रह्मा रूप और चेतना का नया जन्म

"ब्रह्मा रूप हो वेद प्रकट कर, रचे सकल संसार॥"

यहाँ वेद केवल ग्रंथ नहीं हैं।
संतमत में वेद का एक अर्थ वह आंतरिक जागृति भी है जो गुरु की कृपा से उत्पन्न होती है।
जब गुरु किसी साधक के भीतर विवेक जगाते हैं, तब उसका एक नया जन्म होता है। वह पहले भी जीवित था, लेकिन अब जागृत होता है।
इस अर्थ में गुरु ब्रह्मा हैं।
वे केवल ज्ञान नहीं देते, बल्कि चेतना का पुनर्जन्म कराते हैं।
जिस दिन साधक को पहली बार यह अनुभव होता है कि "मैं केवल शरीर नहीं हूँ", उसी दिन उसके भीतर एक नई सृष्टि आरम्भ हो जाती है।

विष्णु रूप और सुरत का पालन

"विष्णु रूप हो विश्व को पालत, धर्म हेतु ले अवतार॥"

पालन केवल शरीर का नहीं होता।
साधना के मार्ग पर सबसे कठिन काम है — जागी हुई चेतना को स्थिर रखना।

कई बार साधक प्रेरित होता है, फिर संसार में उलझ जाता है। कुछ समय भजन करता है, फिर मन भटक जाता है।
यहीं गुरु का विष्णु रूप कार्य करता है।
वे बार-बार सुरत को शब्द की ओर लौटाते हैं।
वे साधक के भीतर श्रद्धा, विवेक, प्रेम और धैर्य का संरक्षण करते हैं।
यह पालन बाहर से कम दिखाई देता है, लेकिन भीतर सबसे महत्वपूर्ण होता है।

रुद्र रूप और झूठे "मैं" की प्रलय

"रुद्र रूप धर दुष्ट रुलावत, प्रलय करे संहार॥"

इस पद का अर्थ केवल विकारों का नाश नहीं है।
काम, क्रोध, लोभ और मोह तो शाखाएँ हैं।
मूल जड़ है — "मैं"।
मैं शरीर हूँ।
मैं कर्ता हूँ।
मैं श्रेष्ठ हूँ।
मैं अलग हूँ।
यही अज्ञान का केंद्र है।
जब गुरु का ज्ञान भीतर प्रवेश करता है, तब इसी झूठे "मैं" की प्रलय आरम्भ होती है।
इसीलिए संतों की भाषा में रुद्र विनाशक नहीं, मुक्तिदाता है।
जो टूट रहा है, वह सत्य नहीं है।
जो मिट रहा है, वह भ्रम है।
और जब भ्रम मिटता है, तब आत्मा पहली बार स्वयं को पहचानती है।

मुमुक्षुओं के लिए गुरु का अवतरण

"अचलराम मुमुक्षुओं के कारण, गुरु मूर्ति ले धार॥"

यह भजन का हृदय है।
परम सत्य निराकार है, लेकिन मुमुक्षु को मार्गदर्शन चाहिए।
उसे किसी ऐसे की आवश्यकता है जो उस मार्ग को स्वयं चल चुका हो।
इसी करुणा से गुरु मानव रूप धारण करते हैं।
वे इसलिए नहीं आते कि लोग उनकी पूजा करें।
वे इसलिए आते हैं कि भटकी हुई सुरत को उसके मूल घर का मार्ग बता सकें।
गुरु केवल रास्ता दिखाने वाले नहीं हैं। साधक की सुरत जिस शब्द से जुड़कर अपने मूल तक पहुँचती है, उस शब्द का जीवित प्रतिनिधित्व गुरु ही हैं। इसलिए गुरु को केवल शिक्षक नहीं, बल्कि स्वयं पुल कहा गया है।
"मुमुक्षु" केवल मोक्ष चाहने वाला नहीं है।
मुमुक्षु वह है जिसकी आत्मा संसार के अस्थायी सुखों से तृप्त नहीं होती।
जिसके भीतर एक प्रश्न बार-बार उठता है —
"मैं वास्तव में कौन हूँ?"
यही प्रश्न अंततः गुरु तक पहुँचाता है।
और यही प्रश्न साधक को भीतर की यात्रा पर ले जाता है।

एक संतमतीय चिंतन

इस भजन को पढ़ते समय मन में एक प्रश्न बार-बार उठता है।
क्या मेरा प्रणाम केवल शरीर का है या भीतर भी कुछ झुक रहा है?
क्या मैं गुरु को केवल एक पूजनीय व्यक्ति मानता हूँ, या उस चेतना के रूप में देखता हूँ जो मुझे मेरे वास्तविक स्वरूप तक ले जाना चाहती है?
क्या मेरी सुरत आज भी संसार के असंख्य आकर्षणों में भटक रही है, या उसने कभी भीतर लौटने का प्रयास किया है?
संत अचलराम जी का यह भजन वास्तव में गुरु की महिमा का गीत कम और सुरत की यात्रा का निमंत्रण अधिक है।
गुरु ब्रह्मा हैं — क्योंकि वे जगाते हैं।
गुरु विष्णु हैं — क्योंकि वे संभालते हैं।
गुरु महेश हैं — क्योंकि वे मिटाते हैं।
और गुरु परब्रह्म हैं — क्योंकि अंततः वही साधक को उसके मूल स्वरूप से मिला देते हैं।
शायद इसी कारण संत बार-बार प्रणाम करते हैं।
क्योंकि उन्हें ज्ञात हो जाता है कि जिस गुरु को वे बाहर प्रणाम कर रहे हैं, वही चेतना भीतर भी विराजमान है।
और जब यह अनुभव हो जाता है, तब प्रणाम केवल क्रिया नहीं रहता — वह जीवन की स्वाभाविक अवस्था बन जाता है।


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