मैं अभी भी याद कर सकता हूं। शाम ढलती, सूरज पीछे की छत से नीचे उतरता, और पिताजी अपनी पुरानी कुर्सी से उठते। हाथ में पीतल की थाली, उसमें दीया, कपूर, लौंग-इलायची की खुशबू। और फिर वह आवाज़ — जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा...
मां रसोई से झांकतीं, मैं और मेरी बहन अपनी किताबें बंद कर देते। क्योंकि पिताजी की आरती शुरू हो गई तो घर में कोई काम नहीं, कोई बहाना नहीं। वह कहते थे, "बेटा, गणेश जी की आरती में अगर मन लगा लो, तो बाकी सब अपने आप लग जाएगा।"
उस दिन मुझे नहीं पता था कि यह आरती कहां से आई, किसने लिखी। बस पता था कि जब यह गाते हैं, तो कुछ अंदर से साफ हो जाता है। आज, बहुत साल बाद, पिताजी की उसी कुर्सी पर बैठकर मैं सोचता हूं कि यह आरती आखिर है क्या। और पिताजी की यादों में, इसके मायने थोड़े-थोड़े खुलते हैं।
जय गणेश देवा आरती (संपूर्ण पाठ)
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
जय गणेश......
एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे, मूस की सवारी॥
जय गणेश......
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
जय गणेश......
पान चढ़े, फल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन को भोग लागे, संत करें सेवा॥
जय गणेश......
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
जय गणेश......
अंधे को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
जय गणेश......
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
जय गणेश......
‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
जय गणेश......
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
जय गणेश......
यह आरती कब और किसने लिखी?
पिताजी एक बार कह रहे थे, "बेटा, इस आरती का लेखक कोई एक आदमी नहीं है। यह लोक-गीत है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनता गया।" लेकिन जब मैंने पूछा कि फिर 'सूर' कौन है जो अंत में आता है, तो पिताजी मुस्कुराए। बोले, "वह संत सूरदास हैं। लेकिन यह आरती उनके जमाने से पहले भी गाई जाती रही होगी। सूरदास ने इसमें अपनी पंक्ति जोड़ी, और फिर यह वैसी ही चलती आई।"
पिताजी कहते थे कि यह आरती मराठी संत परंपरा से जुड़ी है, शायद 17वीं-18वीं सदी में उस रूप में स्थिर हुई जो आज हम गाते हैं। लेकिन इसकी जड़ें बहुत पुरानी हैं। गणेश जी की पूजा तो सदियों से चली आ रही है, और आरती का रूप धीरे-धीरे बनता गया। पिताजी कहते थे, "जैसे नदी बहती है और रास्ते में नए मोड़ लेती है, वैसी ही यह आरती है।"
इस आरती का भावार्थ — पिताजी की व्याख्या
"जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा"
पिताजी कहते थे, "देखो बेटा, सबसे पहले गणेश जी का नाम लिया, फिर उनके माता-पिता का। यह भारतीय संस्कृति की खासियत है — पहले भगवान, फिर उनके परिवार। गणेश जी की पूजा में शिव-पार्वती का स्मरण अनिवार्य है।" मैंने पूछा, "पिताजी, क्यों?" वह बोले, "क्योंकि कोई भी बच्चा अपने माता-पिता के बिना अधूरा है। और गणेश जी तो सबसे पहले माता-पिता का सम्मान करने वाले हैं। तुम्हें पता है न, उन्होंने अपनी मां की आज्ञा में अपना सिर कटवा दिया था।"
"एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी। माथे सिंदूर सोहे, मूस की सवारी"
अब आरती में गणेश जी का वर्णन शुरू होता है। पिताजी कहते थे, "एक दंत — यह बहुत गहरी बात है। गणेश जी ने अपना एक दांत तोड़कर व्यास जी को महाभारत लिखने में मदद की थी। यह त्याग का प्रतीक है। और दयावंत — वह दयालु हैं, भले ही रूप में वीरता हो।" चार भुजाएं — पिताजी कहते थे कि यह चारों दिशाओं का संरक्षण है। माथे पर सिंदूर — यह शुभता का प्रतीक। और मूसकी सवारी — पिताजी हंसते हुए कहते थे, "देखो बेटा, गणेश जी ने चूहे को अपना वाहन बनाया। चूहा चंचल होता है, लेकिन गणेश जी के नीचे वही चूहा शांत हो जाता है। यह गणेश जी की शक्ति है — वे चंचल मन को भी वश में कर लेते हैं।"
"पान चढ़े, फल चढ़े और चढ़े मेवा। लड्डुअन को भोग लागे, संत करें सेवा"
यहां आरती में भोग का वर्णन है। पिताजी कहते थे, "गणेश जी को मोदक, लड्डू बहुत प्रिय हैं। लेकिन यहां एक बात और है — पान, फल, मेवा, यह सब साधारण चीजें हैं। गणेश जी महंगी चीजें नहीं मांगते। जो भी तुम्हारे पास है, वही चढ़ा दो।" और फिर वह कहते, "संत करें सेवा — यह बहुत मायने रखता है। सेवा संतों की होती है, अहंकारियों की नहीं।"
"अंधे को आंख देत, कोढ़िन को काया। बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया"
यह मेरा सबसे पसंदीदा हिस्सा था। पिताजी इस पर बहुत जोर देते थे। वह कहते, "देखो बेटा, गणेश जी क्या देते हैं? आंखें, शरीर, संतान, धन। यह सब वो चीजें हैं जिनके बिना जीवन अधूरा है।" मैंने एक बार पूछा, "पिताजी, क्या गणेश जी सच में अंधे को आंखें देते हैं?" पिताजी ने मेरी तरफ देखा और बोले, "बेटा, यह आंखें शारीरिक नहीं, आत्मिक हैं। जो अंधा है वो ज्ञान से, उसे ज्ञान की आंखें मिलती हैं। जो कोढ़ी है वो पापों से, उसे पवित्रता मिलती है। यह रूपक है, सीधा अर्थ नहीं।"
"सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा"
अंत में सूरदास अपना नाम लेते हैं। पिताजी कहते थे, "यह पंक्ति बहुत मायने रखती है। सूरदास कहते हैं कि मैं शरण में आया हूं, मेरी सेवा सफल करो।" मैंने पूछा, "पिताजी, श्याम कौन है?" वह बोले, "श्याम कृष्ण हैं, लेकिन यहां गणेश जी की आरती में सूरदास अपने इष्ट को याद कर रहे हैं। भक्त अपने इष्ट को कभी नहीं भूलता, चाहे किसी की भी आरती गा रहा हो।"
इस आरती से क्या शिक्षा मिलती है?
पिताजी हमेशा कहते थे, "बेटा, आरती सिर्फ गाना नहीं है, समझना है।"
पहली बात — सबसे पहले बाधाएं हटाओ। गणेश जी विघ्नहर्ता हैं। पिताजी कहते थे, "कोई भी काम शुरू करने से पहले गणेश जी का नाम लो। यह भारतीय संस्कृति की बुनियाद है।" मैंने पूछा, "पिताजी, क्यों?" वह बोले, "क्योंकि बिना बाधा हटाए, रास्ता साफ नहीं होता। और गणेश जी वो बाधा हटाते हैं जो हमें खुद नहीं दिखती।"
दूसरी बात — माता-पिता का सम्मान सबसे पहले। गणेश जी की आरती में सबसे पहले उनके माता-पिता का नाम आता है। पिताजी कहते थे, "यह संदेश है — भगवान की पूजा में भी माता-पिता पहले।" मैंने पूछा, "पिताजी, क्या यह हमारे लिए भी है?" वह मुस्कुराए और बोले, "हां बेटा, तुम्हारे लिए भी।"
तीसरी बात — त्याग बड़ा है। एक दंत का मतलब — गणेश जी ने अपना दांत तोड़ दिया। पिताजी कहते थे, "जो अपना कुछ तोड़ सकता है, वही कुछ बना सकता है। महाभारत इसीलिए लिखी जा सकी।"
चौथी बात — सेवा में अहंकार मत लाओ। "संत करें सेवा" — पिताजी कहते थे, "सेवा संत की होती है, राजा की नहीं। जो सेवा में अहंकार लाता है, वो सेवा नहीं करता, वो दिखावा करता है।"
पांचवीं बात — जो खोया है वो मिल सकता है। अंधे को आंखें, बांझ को संतान, निर्धन को धन। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह आशा की बात है। कि जो तुम्हें लगता है कि खो गया, वो वापस मिल सकता है। बस सच्चे मन से मांगो।"
यह आरती कब गाई जाती है?
सुबह, शाम, किसी भी पूजा से पहले। लेकिन पिताजी कहते थे कि इसका सबसे अच्छा समय वो है जब कोई नया काम शुरू हो। मैंने देखा है — नया घर, नई दुकान, नई किताब, नया साल। हर जगह यह आरती पहले गाई जाती है।
पिताजी कहते थे, "गणेश चतुर्थी पर तो यह आरती पूरे देश में गूंजती है। लेकिन मेरे लिए सबसे खास वो शाम थी जब तुम्हारी बहन का जन्म हुआ था। मैंने यही आरती गाई थी।" मैंने पूछा, "पिताजी, क्यों?" वह बोले, "क्योंकि नया जीवन, नया काम। और हर नए काम में गणेश जी पहले।"
मेरे एक पड़ोसी थे, बहुत गरीब थे। उनका बेटा पहली बार नौकरी पर जा रहा था। सुबह-सुबह पिताजी गए, थाली लेकर। और वो आरती गाई — जय गणेश, जय गणेश... वो आदमी रोने लगा। पिताजी ने कहा, "रो मत भाई, गणेश जी ने रास्ता दिखाया है, अब चलना है।"
यह आरती इतनी पॉपुलर क्यों है?
पिताजी इसका जवाब बड़ी सरलता से देते थे।
पहली बात — सरल है। कोई कठिन शब्द नहीं, कोई संस्कृत नहीं। बच्चा भी गा सकता है, बुजुर्ग भी। पिताजी कहते थे, "जो सरल हो, वो लंबा चलता है।"
दूसरी बात — सबको लगती है अपनी। हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई — सब गणेश जी को मानते हैं। पिताजी कहते थे, "गणेश जी किसी एक के नहीं, सबके हैं।"
तीसरी बात — मांगने की आजादी है। आंखें, संतान, धन — जो चाहो मांगो। पिताजी कहते थे, "भक्ति में मांगना पाप नहीं है। गणेश जी देने वाले हैं, मांगो।"
चौथी बात — धुन पकड़ में आती है। एक बार सुनो, दो बार सुनो, तीसरी बार खुद गाने लगो। पिताजी कहते थे, "जो धुन दिल में उतर जाए, वो आरती हमेशा याद रहती है।"
FAQs अक्सर पूछे जाने वाले सवाल — पिताजी के जवाब
1. यह आरती किसने लिखी?
पिताजी कहते थे, "कोई एक आदमी नहीं। यह लोक-गीत है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनती गई। सूरदास ने अपनी पंक्ति जोड़ी, और फिर यह वैसी ही चलती आई। जैसे नदी बहती है और रास्ते में नए मोड़ लेती है।"
2. 'सूर' कौन है जो अंत में आता है?
"संत सूरदास हैं। वे अपनी शरण में आने की बात कहते हैं। लेकिन यह पंक्ति बाद में जोड़ी गई, आरती की मूल रचना से पहले की नहीं।"
3. गणेश जी को लड्डू क्यों प्रिय हैं?
पिताजी मुस्कुराते हुए कहते, "यह पुराणों की कथा है। एक बार गणेश जी ने बहुत सारे मोदक खाए थे। लेकिन मेरे लिए इसका मतलब यह है — गणेश जी मीठे हैं, उन्हें मीठा प्रिय है। और मीठा तो सबको प्रिय है न?"
4. "अंधे को आंख देत" — क्या यह सच होता है?
"बेटा, यह रूपक है। अंधापन ज्ञान का है, आंखें ज्ञान की मिलती हैं। जो कोढ़ी है वो पापों से, उसे पवित्रता मिलती है। सीधा मत लो, गहरा समझो।"
5. यह आरती सिर्फ हिंदुओं के लिए है?
"गणेश जी सबके हैं। मैंने मुस्लिम गायकों को भी यह गाते सुना है। भक्ति किसी धर्म की मोहताज नहीं होती।"
6. इस आरती को गाने का सबसे अच्छा समय क्या है?
"जब भी मन व्याकुल हो, जब कोई नया काम शुरू हो, जब लगे कि रास्ता नहीं मिल रहा। और हां, शाम को जब घर में दीया जले। पिताजी कहते थे, शाम की आरती में कुछ खास होता है।"
7. क्या आरती सिर्फ गाना है?
"नहीं, आरती समझना है। हर शब्द का मतलब समझो, हर पंक्ति का भाव समझो। जब समझकर गाओगे, तब असली आरती होगी।"
अंत में...
पिताजी की वो थाली आज भी मेरे पास है। पीतल की, थोड़ी मुड़ी हुई, किनारे पर हाथ से बना काम। जब मैं शाम को उसे उठाता हूं, तो लगता है कि पिताजी का हाथ अभी भी उस पर है।
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा...
यह आरती मेरे लिए सिर्फ भजन नहीं है। यह पिताजी की याद है, वो शामें हैं जब घर मंदिर बन जाता था, वो पल जब कुछ कहने की जरूरत नहीं होती थी, बस गाना काफी था।
पिताजी कहते थे, "बेटा, गणेश जी विघ्नहर्ता हैं। लेकिन सबसे बड़ा विघ्न यहां है —" वो अपने सीने पर हाथ रखते, "यहां। जब यह साफ हो जाता है, तो बाहर के सब विघ्न अपने आप हट जाते हैं।"
आज जब मैं यह आरती गाता हूं, तो समझता हूं कि पिताजी क्या कह रहे थे। गणेश जी बाहर नहीं, अंदर भी हैं। और जब अंदर का दीया जलता है, तो बाहर का अंधेरा अपने आप भाग जाता है।
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा...
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा...
