बिजली गई हुई थी। गर्मी की रात, पंखा रुका हुआ, और मैं अपनी चारपाई पर पसीने में भीगा लेटा था। पिताजी मोमबत्ती जला रहे थे। अचानक उनकी आवाज़ आई — हल्की, गुनगुनाती हुई — पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। मैंने पूछा, "पिताजी, यह कौन गा रहा है?" वह मुस्कुराए। "बेटा, मीराबाई। और सुनो तो लगता है कि किसी ने सच में कुछ पाया है।"
मुझे तब लगा था कि कोई राजकुमारी अपने खजाने की बात कर रही है। सोना-चांदी वाली। बड़ा होने पर पता चला कि यह खजाना कुछ और ही है। ऐसा धन जिसे कोई नहीं लूट सकता, जो कभी खत्म नहीं होता।
भजन
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो
पायो जी मैंने.....
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु,
कर किरपा अपनायो।
पायो जी मैंने.....
जन्म-जन्म की पूंजी पाई,
जग में सभी खोवायो।
पायो जी मैंने.....
खरच नाहि खूटे चोर नाहि लूटै,
दिन-दिन बढ़त सवायो।
पायो जी मैंने.....
सत् की नाव खेवटिया सतगुरु,
भवसागर तर आयो।
पायो जी मैंने.....
मीरा के प्रभु गिरधर नागर,
हरख-हरख जस गायो।
पायो जी मैंने.....
मीराबाई — जो राजमहल छोड़कर नाचती हुई चली गई
1498 में राजस्थान के कुडकी गांव में एक बच्ची पैदा हुई। रतनसिंह राठौड़ की बेटी। छह साल की उम्र में शादी तय हुई मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से। लेकिन भोजराज की मृत्यु जल्दी हो गई। मीरा विधवा हो गईं।
यहां से कहानी मुड़ती है। पिताजी एक बार बोले थे, "बेटा, जब कोई सच्ची चीज पा लेता है, तो दुनिया की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती।" मीरा ने ससुराल में बहुत सहा। धमकियां मिलीं, जान लेने की कोशिश हुई। लेकिन वे वृंदावन चली गईं, फिर द्वारका। 1547 में चली गईं। लेकिन जब भी कोई पायो जी गाता है, मीरा फिर से जाग उठती है।
मैंने एक बार वृंदावन गया था। एक बुजुर्ग भजन गायक ने यही भजन गाया। आंखें बंद करके सुना। लगा कि मीरा खुद वहीं कहीं बैठी हैं।
इस भजन में मीरा किस धन की बात कर रही हैं?
यही तो सबसे खूबसूरत बात है। मीरा सोने-चांदी, जमीन-जायदाद की बात नहीं कर रही हैं। वह राम रतन धन की बात कर रही हैं — भगवान का नाम, प्रेम, भक्ति, वह अनुभव जो आत्मा को शांति देता है।
हम सब जानते हैं न, कि दुनिया का धन कितना अस्थिर है। कल तक जो था, आज नहीं रहा। मेरे एक मित्र का बिजनेस डूब गया था। रोज़ सुबह यह भजन सुनता था। एक दिन पूछा, "भाई, यही क्यों?" वह बोला, "जब लगे कि सब कुछ खो गया, तब यह याद दिलाता है कि कुछ अभी बाकी है।" कुछ साल बाद वह फिर से खड़ा हुआ। लेकिन अब उसे पता था कि असली धन क्या है।
एक-एक पंक्ति में वह गहराई
"पायो जी मैंने राम रतन धन पायो"
मीरा सीधे कहती हैं — मुझे एक ऐसा खजाना मिला है जो अनमोल है। यहां "पायो" शब्द बहुत मायने रखता है। मीरा कह रही हैं कि मिल गया, अब ढूंढने की जरूरत नहीं। यह कोई आशा नहीं, यह अनुभव है। और फिर वह कहती हैं — वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, कर किरपा अपनायो। बिना गुरु की कृपा के यह धन नहीं मिलता। यह भक्ति की पहली सीख है — अहंकार छोड़ो, किसी और को याद करो।
"जन्म-जन्म की पूंजी पाई, जग में सभी खोवायो"
यह पंक्ति पढ़ते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मीरा कहती हैं कि हम कई जन्मों से धन इकट्ठा कर रहे थे, लेकिन हर बार इस दुनिया में आकर सब खो दिया। कभी सोचा है? हम कितनी चीजें जोड़ते हैं — नौकरी, पैसा, रिश्ते, सब कुछ। और एक दिन सब यहीं रह जाता है। लेकिन जो नाम की पूंजी है, वह साथ चलती है।
"खरच नाहि खूटे चोर नाहि लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो"
मेरा सबसे पसंदीदा हिस्सा। मीरा कहती हैं कि इस धन को खर्च करने से कम नहीं होता। कोई चोर इसे नहीं लूट सकता। और हर दिन यह बढ़ता ही जाता है। सच में, जब आप रोज़ भजन करते हैं, तो वह शांति, वह आनंद बढ़ता है। पहले दस मिनट में जो मिला, वह सौ मिनट में और गहरा हो जाता है। यह कोई बैंक बैलेंस नहीं जो कम हो जाए।
"सत् की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो"
यहां मीरा एक बहुत सुंदर तुलना करती हैं। वह इस संसार को एक विशाल समुद्र मानती हैं — भवसागर। और सतगुरु को नाव का खेवट। बिना खेवट के इस समुद्र को पार कौन कर सकता है? कभी-कभी जिंदगी में भी ऐसा होता है न? हम किसी का इंतज़ार करते रहते हैं, और वह क्षण आता ही नहीं। लेकिन मीरा कहती हैं कि खेवट मिल गया, समुद्र पार हो गया।
"मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख-हरख जस गायो"
अंत में मीरा अपने प्रभु गिरधर नागर (कृष्ण) का नाम लेती हैं और कहती हैं कि वह हर्ष-हर्षकर उनका जस गा रही हैं। यह हरख-हरख बहुत मायने रखता है। यह कोई जबरदस्ती का गान नहीं, बल्कि दिल से निकली खुशी है। जब आपको सच में कुछ अच्छा मिलता है, तो आप रुकते नहीं, गाते रहते हैं। मीरा वही कर रही हैं।
इस भजन से क्या सीख मिलती है?
पहली बात — असली धन वही है जो कभी नहीं खत्म होता। हम अपनी पूरी जिंदगी बाहरी चीजें जोड़ने में लगा देते हैं। घर, गाड़ी, बैंक बैलेंस। लेकिन जब आंखें बंद होती हैं, तो क्या साथ जाता है? मीरा हमें याद दिलाती हैं कि नाम की पूंजी ही सच्ची पूंजी है।
दूसरी बात — गुरु की महिमा। मीरा बार-बार सतगुरु का जिक्र करती हैं। बिना सच्चे मार्गदर्शक के यह यात्रा मुश्किल है। गुरु कोई जरूरी नहीं कि वेशधारी संत ही हो। कभी-कभी एक अच्छी किताब, एक अच्छा मित्र, या जीवन की कोई घटना भी गुरु बन जाती है।
तीसरी बात — भक्ति में कोई डर नहीं। मीरा ने जीवन में बहुत कुछ सहा। लेकिन उनके भजन में कभी शिकायत नहीं, सिर्फ आनंद है। यह सिखाता है कि जब आपको वह अंदरूनी धन मिल जाता है, तो बाहरी हालात कुछ भी हों, आप टूटते नहीं।
चौथी बात — खोना और पाना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मीरा कहती हैं कि जन्म-जन्म की पूंजी खो दी, लेकिन एक धन मिला जो सब कुछ बदल गया। कभी-कभी जिंदगी में खोना जरूरी होता है, ताकि असली चीज मिल सके।
यह भजन किस राग में गाया जाता है?
यह भजन अक्सर भैरवी राग में गाया जाता है। लेकिन कभी-कभी भूपाली में भी। सबसे ज्यादा जो इसे गाया, वह लता मंगेशकर जी हैं। उनकी आवाज़ में यह भजन एक अलग जान पा गया। मैंने एक बार उनकी रिकॉर्डिंग सुनी थी, पिताजी के पुराने टेप रिकॉर्डर पर। वह आवाज़ आज भी कान में गूंजती है।
इसके अलावा अनूप जलोटा जी, हरिहरन जी, शुभा मुद्गल जी — कई कलाकारों ने इसे अपना रंग दिया। हर किसी की आवाज़ में एक अलग मीरा सुनाई देती है। यही इस भजन की शक्ति है।
यह भजन इतना प्रसिद्ध क्यों है?
भाषा सरल है। कोई कठिन शब्द नहीं। बच्चा भी समझ सकता है, बुजुर्ग भी। मीरा ने जानबूझकर सरल भाषा चुनी। क्योंकि सच्ची बात सरल भाषा में ही आती है।
हर किसी की कहानी है। हम सब कुछ खो चुके हैं, हम सब कुछ पाना चाहते हैं। मीरा कहती हैं कि मैंने पा लिया। यह आशा देती है। जब लगे कि सब कुछ खत्म हो गया, तब यह भजन याद दिलाता है कि कुछ अभी बाकी है।
मीरा की कहानी खुद में ही प्रेरणा है। एक राजकुमारी जो राजमहल छोड़कर सड़कों पर नाचती हुई गा रही थी। लोग उन्हें पागल कहते थे। लेकिन वह जानती थीं कि उनके पास क्या है। कभी-कभी जो दुनिया पागलपन कहती है, वही सबसे बड़ी समझदारी होती है।
और धुन। वो धुन जो एक बार सुनो, दो बार सुनो, तीसरी बार खुद गाने लगो। जो धुन दिल में उतर जाए, वो भजन हमेशा याद रहता है।
FAQs अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. मीराबाई ने यह भजन कब लिखा?
ठीक तारीख किसी को नहीं मालूम। लेकिन यह उनके परिपक्व काल का भजन लगता है। जब वे वृंदावन या द्वारका में थीं, जब उन्हें वह धन मिल चुका था जो वे ढूंढ रही थीं। यह गीत एक खुश आत्मा का गीत है।
2. "राम रतन धन" का मतलब क्या है — राम या कृष्ण?
मीरा कृष्ण भक्त थीं, लेकिन यहां राम शब्द का प्रयोग भगवान के सामान्य नाम के रूप में हुआ है। हिंदी भक्ति साहित्य में राम अक्सर परमात्मा का पर्यायवाची है। मीरा के लिए यह गिरधर नागर ही हैं।
3. यह भजन सबसे ज्यादा किसने गाया?
लता मंगेशकर जी ने इसे बहुत लोकप्रिय बनाया। उनकी आवाज़ में यह भजन एक अलग जान पा गया। लेकिन अनूप जलोटा जी, हरिहरन जी — कई कलाकारों ने अपना रंग लगाया। हर कलाकार की आवाज़ में एक अलग मीरा सुनाई देती है।
4. "भवसागर" का क्या अर्थ है?
भवसागर का अर्थ है जन्म-मरण का चक्र, इस संसार की माया जो इंसान को डुबो देती है। मीरा कहती हैं कि सतगुरु की कृपा से ही इस समुद्र को पार किया जा सकता है।
5. क्या यह भजन केवल हिंदुओं के लिए है?
बिल्कुल नहीं। इस भजन का संदेश सार्वभौमिक है। किसी भी धर्म या मत का व्यक्ति इसमें उस अंदरूनी शांति की बात पा सकता है जो भक्ति और प्रेम से मिलती है। मीरा का संदेश मानवता के लिए है।
6. मीरा के ससुराल वालों ने उन्हें क्यों रोका?
क्योंकि वे एक राजकुमारी थीं, और राजकुमारियां मंदिर में नहीं, महल में रहती हैं। लेकिन मीरा ने दिखाया कि जब आत्मा को कुछ मिल जाता है, तो कोई महल उसे रोक नहीं सकता। वे वृंदावन चली गईं, और वहीं मिलीं जिन्हें वे ढूंढ रही थीं।
7. इस भजन को सुनने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
शांत वातावरण में, आंखें बंद करके। शब्दों पर ध्यान दो। मीरा की आवाज़ सुनने की कोशिश करो — वह आवाज़ जो सदियों से गूंज रही है। आपको अंदर कुछ हिलता हुआ महसूस होगा। वही असली धन है। मैंने एक बार रात को, अकेले में, यह भजन सुना था। और कुछ पल के लिए लगा कि सब कुछ ठीक है। बस कुछ पल के लिए। लेकिन वो कुछ पल काफी थे।
अंत में...
मैंने कई बार सोचा कि मीराबाई कैसी होंगी। कोई साधारण सी राजकुमारी जो राजमहल छोड़कर सड़कों पर नाचती हुई गा रही थी। लोग उन्हें पागल कहते होंगे। लेकिन वह जानती थीं कि उनके पास क्या है। राम रतन धन।
आज जब हम सब कुछ खोने के डर में जी रहे हैं — नौकरी, पैसा, रिश्ते, सेहत — तब मीराबाई की यह बात याद रखना बहुत जरूरी है। कि एक धन ऐसा भी है जो कभी नहीं खत्म होता। जो चोर नहीं लूट सकता, जो समय नहीं कम कर सकता।
बस उसे पहचानना है। और मीरा की तरह, हरख-हरख उसका जस गाना है।
पिताजी एक बार कह रहे थे, "बेटा, जब तुम्हें लगे कि सब कुछ खत्म हो गया, तब यह भजन गुनगुनाओ। और फिर देखना, एक दरवाजा खुलेगा। शायद वही दरवाजा जो हमेशा खुला था, बस हमारी आंखें बंद थीं।"
उस रात, जब बिजली गई थी और मोमबत्ती जल रही थी, मैंने वो दरवाजा पहली बार देखा था। आज भी, कभी-कभी, जब अंधेरा बहुत होता है, तो वही दरवाजा फिर से खुलता है। बस गुनगुनाना शुरू करो — पायो जी मैंने राम रतन धन पायो...
