पायो जी मैंने राम रतन धन पायो — मीराबाई का यह भजन, दिल से...

        पहली बार यह भजन सुना था... याद है, बहुत छोटा था। दादी सुबह-सुबह झाड़ू लगाती थीं और हल्की आवाज़ में गुनगुनाती थीं — पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। मुझे तब लगा था, यह कोई खजाने की बात हो रही है। सोना-चांदी वाली। बड़ा होने पर पता चला कि यह खजाना कुछ और ही है। ऐसा धन जिसे कोई नहीं लूट सकता, जो कभी खत्म नहीं होता।



और जब मीराबाई के बारे में और जाना, तो समझ आया कि यह गीत किसी साधारण खुशी का नहीं, एक आत्मा की अनंत यात्रा का वर्णन है।


भजन

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो,

वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, कर किरपा अपनायो।

पायो जी मैंने.....

जन्म-जन्म की पूंजी पाई,

जग में सभी खोवायो।

पायो जी मैंने.....

खरच नाहि खूटे चोर नाहि लूटै,

दिन-दिन बढ़त सवायो।

पायो जी मैंने.....

सत् की नाव खेवटिया सतगुरु,

भवसागर तर आयो।

पायो जी मैंने.....

मीरा के प्रभु गिरधर नागर,

हरख-हरख जस गायो।

पायो जी मैंने.....


मीराबाई कौन थीं? एक नज़र उनके जीवन पर

मीराबाई का जन्म 1498 में राजस्थान के कुडकी गांव में हुआ। उनके पिता रतनसिंह राठौड़ थे। बचपन से ही मीरा में कुछ अलग था। जब उनकी शादी मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से तय हुई, तब वह केवल छह साल की थीं। लेकिन भोजराज की मृत्यु जल्दी हो गई और मीरा विधवा हो गईं।


अब यहां से उनकी असली कहानी शुरू होती है।

ससुराल वालों ने उन्हें कई बार रोका, धमकाया, कभी-कभी तो जान तक लेने की कोशिश की गई। लेकिन मीरा ने कृष्ण भक्ति का रास्ता नहीं छोड़ा। वे वृंदावन चली गईं, फिर द्वारका। लोग कहते हैं कि वे अंत में कृष्ण की मूर्ति में ही समा गईं। 1547 में उनका देहावसान हुआ, लेकिन उनके भजन आज भी जिंदा हैं। जब भी कोई पायो जी गाता है, मीरा फिर से जाग उठती हैं।


इस भजन में मीरा किस धन की बात कर रही हैं?

यही तो सबसे खूबसूरत बात है। मीरा सोने-चांदी, जमीन-जायदाद की बात नहीं कर रही हैं। वह राम रतन धन की बात कर रही हैं — भगवान का नाम, प्रेम, भक्ति, वह अनुभव जो आत्मा को शांति देता है।

हम सब जानते हैं न, कि दुनिया का धन कितना अस्थिर है। कल तक जो था, आज नहीं रहा। लेकिन मीरा कहती हैं कि उन्हें ऐसा खजाना मिला है जो न खर्च होता है, न चोर लूट सकता है, न आग जला सकती है। यह धन दिन-दिन बढ़ता है। क्या यह बात सच नहीं लगती? जितना भजन करो, उतना ही मन शांत होता है। यह कोई बैंक बैलेंस नहीं जो कम हो जाए।


भजन का भावार्थ — एक-एक पंक्ति का मतलब

"पायो जी मैंने राम रतन धन पायो"

मीरा कहती हैं — हे प्रभु, मुझे एक ऐसा खजाना मिला है जो अनमोल है। यह राम नाम का रत्न है। और यह मुझे मेरे सतगुरु ने कृपा करके दिया है। यहां मीरा अपने गुरु का स्मरण करती हैं। बिना गुरु की कृपा के यह धन नहीं मिलता।


"जन्म-जन्म की पूंजी पाई, जग में सभी खोवायो"

यह पंक्ति पढ़ते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मीरा कहती हैं कि हम कई जन्मों से धन इकट्ठा कर रहे थे, लेकिन हर बार इस दुनिया में आकर सब खो दिया। कभी सोचा है? हम कितनी चीजें जोड़ते हैं — नौकरी, पैसा, रिश्ते, सब कुछ। और एक दिन सब यहीं रह जाता है। लेकिन जो नाम की पूंजी है, वह साथ चलती है।


"खरच नाहि खूटे चोर नाहि लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो"

यह मेरा सबसे पसंदीदा हिस्सा है। मीरा कहती हैं कि इस धन को खर्च करने से कम नहीं होता। कोई चोर इसे नहीं लूट सकता। और हर दिन यह बढ़ता ही जाता है। सच में, जब आप रोज़ भजन करते हैं, तो वह शांति, वह आनंद बढ़ता है। पहले दस मिनट में जो मिला, वह सौ मिनट में और गहरा हो जाता है।


"सत् की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो"

यहां मीरा एक बहुत सुंदर तुलना करती हैं। वह इस संसार को एक विशाल समुद्र मानती हैं — भवसागर। और सतगुरु को नाव का खेवट (मल्लाह)। सच्चे गुरु की शरण में रहकर ही इस संसार-समुद्र को पार किया जा सकता है। बिना नाव के तैराकी कौन कर सकता है इस भवसागर में?


"मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख-हरख जस गायो"

अंत में मीरा अपने प्रभु गिरधर नागर (कृष्ण) का नाम लेती हैं और कहती हैं कि वह हर्ष-हर्षकर उनका जस गा रही हैं। यह हरख-हरख बहुत मायने रखता है। यह कोई जबरदस्ती का गान नहीं, बल्कि दिल से निकली खुशी है। जब आपको सच में कुछ अच्छा मिलता है, तो आप रुकते नहीं, गाते रहते हैं। मीरा वही कर रही हैं।


इस भजन से हमें क्या सीख मिलती है?

सबसे पहली बात — असली धन वही है जो कभी नहीं खत्म होता। हम अपनी पूरी जिंदगी बाहरी चीजें जोड़ने में लगा देते हैं। घर, गाड़ी, बैंक बैलेंस। लेकिन जब आंखें बंद होती हैं, तो क्या साथ जाता है? मीरा हमें याद दिलाती हैं कि नाम की पूंजी ही सच्ची पूंजी है।


दूसरी बात — गुरु की महिमा। मीरा बार-बार सतगुरु का जिक्र करती हैं। बिना सच्चे मार्गदर्शक के यह यात्रा मुश्किल है। गुरु कोई जरूरी नहीं कि वेशधारी संत ही हो। कभी-कभी एक अच्छी किताब, एक अच्छा मित्र, या जीवन की कोई घटना भी गुरु बन जाती है।


तीसरी बात — भक्ति में कोई डर नहीं। मीरा ने जीवन में बहुत कुछ सहा। लेकिन उनके भजन में कभी शिकायत नहीं, सिर्फ आनंद है। यह सिखाता है कि जब आपको वह अंदरूनी धन मिल जाता है, तो बाहरी हालात कुछ भी हों, आप टूटते नहीं।


यह भजन कब गाया जाता है?

मैंने इसे कई मौकों पर सुना है। सुबह के भजन में, जब घर में कोई पूजा होती है। कभी-कभी शाम को जब सूरज डूब रहा हो और घर में दीया जल रहा हो। मंदिरों में, विशेषकर कृष्ण मंदिरों में, जन्माष्टमी के आसपास यह बहुत सुना जाता है।

लेकिन मुझे लगता है कि इस भजन को गाने का कोई खास समय नहीं। जब भी मन उदास हो, जब लगे कि कुछ खो गया है, जब दुनिया बहुत भारी लगे — तब यह गीत गुनगुनाइए। पायो जी... कहते ही कुछ हल्का सा लगने लगता है। जैसे कोई पुराना दोस्त आ गया हो।

मेरे एक मित्र ने एक बार कहा था, जब उनका बिजनेस डूब गया था, तो वह रोज़ सुबह यह भजन सुनते थे। उन्हें लगता था कि जो धन गया, वह गया। लेकिन जो अंदर बचा है, वह काफी है। और धीरे-धीरे सब ठीक हुआ। यह भजन उनकी ताकत बन गया।


FAQs अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न


1. यह भजन मीराबाई ने कब लिखा?

कहा जाता है कि यह भजन मीराबाई ने अपने जीवन के उत्तरार्ध में लिखा, जब वे वृंदावन या द्वारका में थीं। लेकिन ठीक तारीख का कोई प्रमाण नहीं मिलता। यह उनके सबसे प्रसिद्ध भजनों में से एक है।


2. "राम रतन धन" का मतलब क्या है — राम या कृष्ण?

मीरा कृष्ण भक्त थीं, लेकिन यहां राम शब्द का प्रयोग भगवान के सामान्य नाम के रूप में हुआ है। हिंदी भक्ति साहित्य में राम अक्सर परमात्मा का पर्यायवाची है। मीरा के लिए यह गिरधर नागर (कृष्ण) ही हैं।


3. यह भजन किस राग में गाया जाता है?

यह भजन अक्सर भैरवी या भूपाली राग में गाया जाता है। लेकिन आजकल कलाकार अपनी शैली में इसे विभिन्न रागों में प्रस्तुत करते हैं। मशहूर गायिका लता मंगेशकर की आवाज़ में यह भजन बहुत लोकप्रिय हुआ।


4. क्या यह भजन मीराबाई के जीवन की घटना पर आधारित है?

हां, इसमें मीरा अपने अनुभव को बता रही हैं। उन्हें वास्तव में वह अनमोल धन मिला था जिसे दुनिया नहीं समझ सकती थी। उनके ससुराल वालों ने इसे पागलपन समझा, लेकिन मीरा जानती थीं कि उन्हें क्या मिला है।


5. "भवसागर" का क्या अर्थ है?

भवसागर का अर्थ है जन्म-मरण का चक्र, इस संसार की माया जो इंसान को डुबो देती है। मीरा कहती हैं कि सतगुरु की कृपा से ही इस समुद्र को पार किया जा सकता है।


6. इस भजन को सुनने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?

मेरी राय में, शांत वातावरण में, कान में ईयरफोन लगाकर, आंखें बंद करके। शब्दों पर ध्यान दीजिए। मीरा की आवाज़ सुनने की कोशिश कीजिए — वह आवाज़ जो सदियों से गूंज रही है। आपको अंदर कुछ हिलता हुआ महसूस होगा। वही असली धन है।


अंत में...

मैंने कई बार सोचा कि मीराबाई कैसी होंगी। कोई साधारण सी राजकुमारी जो राजमहल छोड़कर सड़कों पर नाचती हुई गा रही थी। लोग उन्हें पागल कहते होंगे। लेकिन वह जानती थीं कि उनके पास क्या है। राम रतन धन।

आज जब हम सब कुछ खोने के डर में जी रहे हैं — नौकरी, पैसा, रिश्ते, सेहत — तब मीराबाई की यह बात याद रखना बहुत जरूरी है। कि एक धन ऐसा भी है जो कभी नहीं खत्म होता। जो चोर नहीं लूट सकता, जो समय नहीं कम कर सकता।

बस उसे पहचानना है। और मीरा की तरह, हरख-हरख उसका जस गाना है।


पायो जी मैंने राम रतन धन पायो...


एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने