गुरु चरण वंदना श्लोक अर्थ | Vande Gurunam Charanaravinde Meaning in Hindi | Guru Mahima Shlok | Guru Purnima Special

।।गुरु चरण वंदना।।

वन्दे गुरूणां चरणारविन्दे
सन्दर्शित स्वात्म सुखावबोधे।
निःश्रेयसे जाङ्गलिकायमाने
संसार हालाहल मोहशान्त्यै॥

।। Guru Charan Vandana ।।

Vande Guroonaam Charanaaravinde,
Sandarshit Svaatma Sukhaavabodhe।
Nihshreyase Jaangalikaayamaane,
Sansaara Haalaahal Moha Shaantyai॥

वन्दे गुरूणां चरणारविन्दे — संस्कृत व्याकरण से देखें तो चरण + अरविंद = चरणारविंद। अरविंद वह कमल है जो कीचड़ में खिलता है पर कीचड़ से अछूता रहता है। भाष्यकार इसे गुरु के चरणों की उपमा देते हैं — संसार में रहते हुए भी संसार से परे। पर संतमत की दृष्टि में यहाँ एक और गहराई है। जब शिष्य वास्तव में वंदना में उतरता है, तो उसका शरीर झुकता है, पर उसकी सूरत ऊपर उठती है। वह क्षण जब अहंकार की पकड़ ढीली पड़ती है। दादू दयाल जी की एक पदावली में आता है — जब सीस झुकावे, तब दृष्टि ऊँची जावे। यह कोई नीच-ऊँच का भेद नहीं, बल्कि वह मुद्रा जिसमें 'मैं' अपना स्थान छोड़ देता है।
Guru Charan Vandana

सन्दर्शित स्वात्म सुखावबोधे — 'सन्दर्शित' में दर्शन है, पर बाहरी नहीं। गुरु ने जो स्वात्म का सुख दिखाया, वह अंतर-दृष्टि से दिखाया। संतमत में इसे 'आत्म-बोध' कहते हैं — वह अनुभव जिसमें जानने वाला, ज्ञान और ज्ञेय तीनों एक हो जाते हैं। यह सुख कोई भोग नहीं, वह शांति जो मोह के तूफान में भी अपने स्थान पर स्थिर रहती है। रैदास जी की बानी में वह 'बेगमपुर' है — जहाँ कोई डर नहीं, कोई कर नहीं, कोई भेदभाव नहीं। गुरु यहाँ केवल बताते नहीं, अपनी सूरत से शिष्य की सूरत को उसके मूल में लगा देते हैं।

निःश्रेयसे जाङ्गलिकायमाने — संस्कृत में 'निःश्रेयस' का मूल विश्लेषण है — निः (बिना) + श्रेयस (उत्तम) = वह परम कल्याण जो संसार के उत्तम से भी परे है। भाष्यकार 'जाङ्गलिक' का अर्थ वैद्य या चिकित्सक बताते हैं, जो वन में भटकते जीवों की सेवा करता है। संतमत की दृष्टि से इसे उस गुरु के रूप में भी देखा जा सकता है जो माया के वन में भटके जीव का मार्गदर्शन करता है। हम सब उस जंगली की तरह हैं — मोह के वन में भटक रहे हैं, और गुरु वह हैं जो हमें उस वन से निकालकर अपने आश्रम में ले आते हैं। यहाँ गुरु का काम रास्ता दिखाना नहीं, रास्ता बनाना है — अपनी कृपा से, अपनी सूरत से।

संसार हालाहल मोहशान्त्यै — 'हालाहल' वह विष जो समुद्र मंथन में निकला था। पुराणों में शिव ने इसे अपने कंठ में धारण किया। संसार का मोह वही हालाहल है — मीठा लगता है, पर अंदर से जला देता है। गुरु इस मोह की शांति के लिए आते हैं। शांति यहाँ उदासीनता नहीं, वह समझ है जिसमें मोह रहते हुए भी मोह नहीं रहता। जैसे कमल पानी में रहता है, पर गीला नहीं होता। गुरु नानक देव जी की बानी में 'जपुजी' का वह अंश याद आता है जहाँ 'साहिब' की मेहर से यह जीवन-मुक्ति होती है। गुरु-कृपा से शिष्य को यह विवेक प्राप्त होता है कि मोह की जड़ बाहर नहीं, अपनी पकड़ में है।

चिंतन — कभी-कभी अपने जीवन को देखकर यह बात और स्पष्ट हो जाती है। जब रात भर जागकर नाम में लीन रहने के बाद भोर की पहली किरण आती है, तो लगता है कि यह श्लोक कोई मंत्र नहीं, एक जीवित अनुभव है। गुरु के चरणों में झुकना कोई क्रिया नहीं, वह अवस्था है जिसमें सब कुछ ठहर जाता है — मन की चंचलता, मोह की पकड़, अज्ञान का अंधेरा। पर यह ठहराव भी क्षणभंगुर है। फिर से माया का वेग आता है, फिर से भटकाव। तब समझ आती है कि यह साधना का रास्ता नहीं, बार-बार लौटने का रास्ता है। और हर बार लौटने पर गुरु वहीं खड़े मिलते हैं। क्या यह आश्रय है, या फिर एक ऐसा सच जिसे हम बार-बार भूल जाते हैं? शायद दोनों एक ही बात हैं।

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