गाँव के मेले में एक बार एक बुजुर्ग साधक बैठे थे। उनके चेहरे पर कोई विशेष भाव नहीं था — न तो कोई उत्साह, न कोई गंभीरता। बस एक शांति थी, जैसे कोई पुराना बरगद का पेड़ बैठा हो। लोग उनके पास आते, कुछ देर बैठते, फिर चले जाते। मैं भी एक दोपहर वहाँ पहुँचा। धूप तेज़ थी, और उन्होंने अपनी खादी की गंजी के आँचल से मुझे छाँव में बुलाया।
"बेटा, भजन सुनना है?" उन्होंने पूछा।
मैंने हाँ में सिर हिलाया। उन्होंने आँखें बंद कीं और गाने लगे — "गुरु हमरे प्रेम पियायो हो..."
वह आवाज़ गाँव की किसी भजन मंडली की नहीं थी। न कोई ताल थी, न कोई संगीत। बस एक आत्मीय धुन, जैसे कोई अपने घर में अकेले बैठकर गुनगुनाता हो। लेकिन जैसे ही वे "अलम चढ़ो गगने लगो" पर पहुँचे, उनकी आवाज़ में एक अजीब सा कंपन आ गया। उनके हाथ हल्के से उठे, फिर वापस गोद में आ गए। आँखें अभी भी बंद थीं।
मैंने बाद में पूछा, "बाबा, यह 'अलम' क्या होता है?"
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, जब गुरु का प्रेम पी लो, तो संसार की सारी मदिरा फीकी लगती है। वह जो मस्ती आती है, वही 'अलम' है। लेकिन इसे शब्दों में नहीं समझा सकते। इसे तो केवल अनुभव कर सकते हो।"
वह दिन मेरे लिए एक मोड़ बन गया। उस दिन से मैंने इस भजन को बार-बार सुना, पढ़ा, और हर बार कुछ नया पाया। आज जब मैं इस पर लिख रहा हूँ, तो वही बुजुर्ग साधक मेरी स्मृति में बैठे हैं, जैसे कह रहे हों — "बेटा, शब्दों से आगे जाना।"
भजन का परिचय
यह भजन संत चरनदास जी की रचना है। यह भजन गुरु-प्रेम, आत्म-परिवर्तन और आध्यात्मिक अनुभूति की गहरी यात्रा का वर्णन करता है। इसमें साधक की आंतरिक अवस्थाओं का चित्रण है — जहाँ से शुरुआत होती है गुरु के प्रेम से, और पहुँचती है तुरिया-पद तक, जो चेतना की सर्वोच्च अवस्था मानी जाती है। यह भजन केवल गाने या सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए है।
संत चरनदास जी का संक्षिप्त परिचय
संत चरनदास जी का जन्म सन् 1703 में राजस्थान के अलवर के पास ढहरा गाँव में हुआ था। उनके पिता का देहांत जब वे केवल सात वर्ष के थे, तब उन्हें दिल्ली लाया गया। उनके गुरु सुखदेव जी थे, जिनका उल्लेख वे अपनी अनेक रचनाओं में करते हैं।
चरनदास जी ने 1753 में चरनदासी वैष्णव संप्रदाय की स्थापना की। उनकी शिक्षाएँ हिंदू-मुस्लिम, अमीर-गरीब, पुरुष-स्त्री सभी के लिए खुली थीं। उनके दो प्रमुख शिष्य — सहजो बाई और दया बाई — दोनों महिलाएँ थीं, जो स्वयं प्रसिद्ध कवयित्री बनीं।
उनकी रचनाएँ मुख्य रूप से हिंदी में हैं और भक्ति, कृष्ण-प्रेम, गुरु-महिमा तथा आध्यात्मिक साधना से संबंधित हैं। उन्होंने कई उपनिषदों पर टीकाएँ भी लिखीं।
उनका जीवन सन् 1782 में ब्रह्मलीन हुआ। उनके समय में राजनीतिक उथल-पुथल और धार्मिक कट्टरता का माहौल था, लेकिन उन्होंने निर्भय होकर प्रेम और भक्ति का मार्ग सभी के लिए खोला।
भजन पाठ
गुरु हमरे प्रेम पियायो हो।
ता दिन तैं पलटो भयो, कुल गोत नसायो हो॥
अलम चढ़ो गगने लगो, अनहद मन छायो हो।
तेजपुंज की सेज पे, प्रीतम गल लायो हो॥
गये दिवाने देसड़े, आनंद दरसायो हो।
सब किरिया सही छूटी तप नेम भुलायो हो॥
त्रिगुणतें ऊपर रहूँ, सुखदेव बसायो हो।
रतनदास दिन रैन, नित तुरिया-पद पायो हो॥
Hinglish Transliteration
Guru hamare prem piyaayo ho.
Taa din tain palato bhayo, kul got nasaayo ho॥
Alam chadho gagane lago, anahad man chhaayo ho.
Tejpunj ki sej pe, preetam gal laayo ho॥
Gaye divaane desadde, aanand darasaayo ho.
Sab kiriyaa sahi chhooti tap nem bhulaayo ho॥
Trigunate oopar rahoon, sukhadev basaayo ho.
Ratandas din rain, nit turiya-pad paayo ho॥
सरल हिंदी रूपांतरण
गुरु ने मुझे अपने प्रेम का रस पिला दिया।
उसी दिन से मेरा जीवन पूरी तरह बदल गया, कुल-वंश का सारा अभिमान मिट गया॥
आध्यात्मिक मस्ती चढ़ी, चेतना ऊँचे आध्यात्मिक स्तर पर पहुँच गई, अनहद नाद ने मन पर पूरी तरह छा लिया।
दिव्य ज्योति की शय्या पर, प्रियतम ने मुझे अपने गले लगा लिया॥
प्रेम में मग्न साधक उस आध्यात्मिक लोक में पहुँच गए, जहाँ परम आनंद का अनुभव हुआ।
सारे बाहरी कर्मकांड, तप और नियम सहज रूप से छूट गए, भूल गए॥
तीनों गुणों से ऊपर की अवस्था में स्थित हूँ, वहाँ परम सुख का निवास है।
चरनदास दिन-रात, निरंतर उस चौथी चेतना-अवस्था — तुरीय-पद को प्राप्त करते हैं॥
पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ
"गुरु हमरे प्रेम पियायो हो"
यहाँ "प्रेम पियायो" का अर्थ केवल "प्रेम दिया" नहीं है। "पियायो" शब्द में एक गहराई है — जैसे कोई माँ अपने बच्चे को दूध पिलाती है, जैसे कोई मेहमान को शरबत पिलाता है, जैसे कोई सखा अपने यार को मदिरा पिलाता है। यहाँ गुरु ने साधक को अपने प्रेम का रस पिलाया है, और वह रस ऐसा है कि एक बार पी लिया तो फिर कुछ और पीने का मन नहीं करता।
संतमत में गुरु को केवल ज्ञान दाता नहीं माना जाता। गुरु प्रेम का सागर है, और शिष्य उस सागर में डूबकर अपनी प्यास बुझाता है। कबीर ने भी कहा है — "गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय।" लेकिन यहाँ तो और आगे की बात है — गुरु ने केवल दिखाया नहीं, बल्कि अपने हाथों से प्रेम का अमृत पिलाया है।
"ता दिन तैं पलटो भयो, कुल गोत नसायो हो"
"पलटो भयो" — यह एक आम शब्द नहीं है। यह उस क्षण का वर्णन है जब जीवन की दिशा ही बदल जाती है। जैसे कोई नाव समुद्र में चल रही हो और अचानक हवा का रुख बदल जाए, नाव मुड़ जाए। ऐसा ही "पलटो" है।
और "कुल गोत नसायो" — यह संतमत की एक महत्वपूर्ण शिक्षा है। जब गुरु का प्रेम मिलता है, तो जाति, वंश, कुल, गोत्र — ये सब मिट जाते हैं। मैंने एक बार एक बुजुर्ग साधक से सुना था, "बेटा, जब गुरु के चरणों में बैठ जाते हो, तो वहाँ न ब्राह्मण रहता है, न शूद्र। वहाँ तो केवल एक प्रेमी रहता है।"
"अलम चढ़ो गगने लगो"
"अलम" शब्द राजस्थानी-ब्रज की लोकभाषा का है। इसका अर्थ है — मस्ती, उन्माद, प्रेम का ऐसा नशा जिसमें संसार का भान कम हो जाता है। लेकिन यह कोई शराब या भांग का नशा नहीं। यह गुरु-प्रेम की मस्ती है, ईश्वर-प्रेम की मस्ती है।
"गगने लगो" — चेतना ऊँचे आध्यात्मिक आकाश में पहुँच गई। गगन का अर्थ केवल आकाश नहीं, बल्कि आंतरिक आकाश है — वह शून्य जहाँ कोई विचार नहीं, कोई चिंता नहीं, केवल शांति है।
"अनहद मन छायो हो"
"अनहद" — यह संत-साहित्य का एक गूढ़ शब्द है। इसका अर्थ है — वह ध्वनि जो बिना किसी वाद्य के, बिना किसी स्रोत के, स्वतः सुनाई देती है। संतमत की अनेक धाराओं में इसे आंतरिक दिव्य ध्वनि के रूप में समझा गया है"
"मन छायो" — यह ध्वनि मन पर इस तरह छा गई कि और कुछ सूझता ही नहीं। जैसे बादल आकाश पर छा जाते हैं, वैसे ही अनहद नाद ने मन को पूरी तरह ढक लिया।
"तेजपुंज की सेज पे, प्रीतम गल लायो हो"
"तेजपुंज" — प्रकाश का विशाल समूह, दिव्य ज्योति। संतमत में यह परमात्मा की ज्योति का प्रतीक है। जब साधक आंतरिक यात्रा में आगे बढ़ता है, तो उसे एक अद्भुत प्रकाश का दर्शन होता है — जो न सूरज जैसा है, न चाँद जैसा, न बिजली जैसा। यह एक शांत, सुंदर, मधुर प्रकाश है।
"सेज" — शय्या, विश्राम का स्थान। यहाँ दिव्य ज्योति की शय्या पर प्रीतम ने साधक को अपने गले लगा लिया। यह किसी भौतिक आलिंगन का वर्णन नहीं है। यह आत्मा और परमात्मा का मिलन है — जहाँ दो नहीं रहते, एक हो जाते हैं।
"गये दिवाने देसड़े, आनंद दरसायो हो"
"दिवाने" — यहाँ प्रेम में मग्न साधक। "देसड़े" — यह ब्रज-भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है "देश"। लेकिन यह कोई भौतिक देश नहीं, बल्कि आध्यात्मिक लोक, परमधाम। जब साधक इस अवस्था में पहुँचता है, तो उसे परम आनंद का अनुभव होता है।
"सब किरिया सही छूटी तप नेम भुलायो हो"
यह एक बहुत महत्वपूर्ण पंक्ति है। "किरिया" का अर्थ है बाहरी धार्मिक कर्मकांड, रीतिरिवाज़, क्रियाएँ। "तप" — तपस्या, कठोर साधना। "नेम" — नियम, व्रत, धार्मिक अनुशासन।
संत चरनदास जी कह रहे हैं कि जब असली अनुभूति हो गई, तो ये सब बाहरी कर्मकांड अपने आप छूट गए। यहाँ यह नहीं कहा जा रहा कि कर्मकांड बुरे हैं। बल्कि यह कहा जा रहा है कि जब अंदर का दीपक जल उठता है, तो बाहर के दीयों की ज़रूरत कम रह जाती है।
मेरे दादाजी कहा करते थे, "बेटा, जब तक बर्तन में पानी नहीं भरोगे, तब तक उसे ढक्कन से ढकना पड़ता है। लेकिन जब पानी भर जाए, तो ढक्कन की क्या ज़रूरत?" वही बात यहाँ है — जब आंतरिक अनुभूति भर जाती है, तो बाहरी नियम स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
"त्रिगुणतें ऊपर रहूँ, सुखदेव बसायो हो"
"त्रिगुण" — प्रकृति के तीन गुण : सत्त्व, रज और तम। संसार की सारी गतिविधि इन्हीं तीन गुणों से संचालित होती है। सत्त्व — ज्ञान, शांति, सात्विकता। रज — कर्म, उत्साह, चंचलता। तम — अज्ञान, आलस्य, अंधकार।
संत चरनदास जी कह रहे हैं कि वे इन तीनों गुणों से ऊपर की अवस्था में स्थित हैं। यह केवल एक दावा नहीं है, बल्कि एक अनुभूति का वर्णन है। जब साधक त्रिगुणों से परे पहुँचता है, तो वहाँ "सुखदेव" — परम सुख, परमात्मा — का निवास है।
"रतनदास दिन रैन, नित तुरिया-पद पायो हो"
"रतनदास" — यहाँ संत चरनदास जी ने अपना नाम "रतनदास" कहा है। "रतन" का अर्थ है मोती, रत्न। वे कह रहे हैं कि वे दिन-रात, निरंतर "तुरिया-पद" में रहते हैं।
"तुरिया-पद" — यह वेदांत और संत-साहित्य की सबसे गूढ़ अवधारणाओं में से एक है। हमारी चेतना की तीन अवस्थाएँ हैं — जाग्रत (जागना), स्वप्न (सपना देखना), और सुषुप्ति (गहरी नींद)। "तुरिया" इन तीनों से परे चौथी अवस्था है — जहाँ चेतना पूरी तरह जागृत है, लेकिन शरीर, मन और बुद्धि सब शांत हैं। यह आत्मज्ञान और परम शांति की सर्वोच्च अवस्था मानी जाती है।
भजन का गहन आध्यात्मिक विश्लेषण
गुरु-प्रेम : आधारशिला
इस भजन की नींव में गुरु-प्रेम है। संत चरनदास जी ने अपने गुरु सुखदेव जी का नाम अपनी अनेक रचनाओं में लिया है। उनके लिए गुरु केवल एक शिक्षक नहीं थे, बल्कि प्रेम का स्रोत थे।
संतमत में गुरु की महिमा इसलिए है कि गुरु वह द्वार है जिससे परमात्मा तक पहुँचा जा सकता है। गुरु शब्द-रूप में परमात्मा का प्रतिनिधित्व करता है। जब गुरु प्रेम पिलाता है, तो वह प्रेम केवल भावनात्मक नहीं होता — वह एक शक्ति है, एक ऊर्जा है, जो शिष्य के भीतर की सारी बाधाएँ तोड़ देती है।
आंतरिक यात्रा का चित्रण
यह भजन एक यात्रा का वर्णन है — लेकिन यह कोई भौतिक यात्रा नहीं। यह आंतरिक यात्रा है, जो गुरु के प्रेम से शुरू होती है और तुरिया-पद तक पहुँचती है। इस यात्रा में कई पड़ाव हैं :
1. प्रेम-पान — गुरु का प्रेम मिलना
2. परिवर्तन — जीवन की दिशा बदलना
3. अभिमान-मोचन — कुल-गोत्र का भान मिटना
4. अलम — आध्यात्मिक मस्ती
5. अनहद नाद — दिव्य ध्वनि का अनुभव
6. तेजपुंज — दिव्य ज्योति का दर्शन
7. प्रीतम-मिलन — परमात्मा से एकाकार
8. किरिया-त्याग — बाहरी कर्मकांड से मुक्ति
9. त्रिगुणातीत — प्रकृति के तीनों गुणों से परे
10. तुरिया-पद — चेतना की सर्वोच्च अवस्था
निर्गुण भक्ति का प्रकाश
संत चरनदास जी निर्गुण भक्ति परंपरा से जुड़े हैं। निर्गुण भक्ति का अर्थ है — बिना रूप-रेखा के, बिना आकार के परमात्मा की उपासना। इस भजन में कहीं भी किसी देवता का नाम नहीं है — न राम, न कृष्ण, न शिव। केवल "प्रीतम" है, "सुखदेव" है, "तेजपुंज" है। यह निर्गुण भक्ति की पहचान है — जहाँ परमात्मा को एक नाम, एक रूप में नहीं बाँधा जाता।
संतमत की दृष्टि से अर्थ
सुरत-शब्द योग
संतमत में "सुरत-शब्द योग" एक महत्वपूर्ण साधना है। "सुरत" का अर्थ है आत्मा की चेतना, और "शब्द" का अर्थ है परमात्मा की ध्वनि — अनहद नाद। इस भजन में "अनहद मन छायो" का वर्णन इसी सुरत-शब्द योग का परिणाम है।
जब साधक ध्यान में बैठता है और अपनी चेतना को भीतर की ओर मोड़ता है, तो उसे एक ध्वनि सुनाई देती है। यह ध्वनि बाहर से नहीं आती — यह भीतर से उठती है। यह अनहद नाद है। और जब यह नाद मन पर छा जाता है, तो मन की सारी चंचलता, सारे विचार, सारी चिंताएँ — सब शांत हो जाती हैं।
वैराग्य और प्रेम-भक्ति
इस भजन में वैराग्य का भी गहन चित्रण है। लेकिन यह वैराग्य कठोर नहीं है, न ही नकारात्मक। यह प्रेम से उत्पन्न वैराग्य है — जब गुरु का प्रेम मिल जाता है, तो संसार की सारी चीज़ें फीकी लगती हैं। यह "किरिया सही छूटी" — बाहरी कर्मकांड अपने आप छूट गए। यहाँ कोई ज़बरदस्ती नहीं, कोई संघर्ष नहीं। बस प्रेम इतना गहरा है कि और सब कुछ पीछे छूट गया।
गुरु-शिष्य परंपरा
संत चरनदास जी ने अपने गुरु सुखदेव जी का नाम अपनी रचनाओं में बार-बार लिया है। उनके लिए गुरु केवल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि एक परंपरा थे, एक शक्ति थे। गुरु-शिष्य परंपरा में ज्ञान मुख से मुख, हृदय से हृदय, आत्मा से आत्मा तक पहुँचता है। यह कोई पुस्तकीय ज्ञान नहीं, अनुभव-जन्य ज्ञान है।
प्रतीकों और शब्दों का रहस्य
"अलम" — प्रेम की मस्ती
"अलम" शब्द का प्रयोग इस भजन में बहुत सघन है। यह राजस्थानी-ब्रज की लोकभाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है — मदिरा, मस्ती, उन्माद। लेकिन यहाँ यह भौतिक मदिरा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मदिरा है।
जब गुरु का प्रेम मिलता है, तो साधक की चेतना में एक ऐसी मस्ती आती है जिसमें संसार का भान कम हो जाता है। यह "अलम" है। यह वह अवस्था है जहाँ साधक हँसता है बिना किसी कारण के, नाचता है बिना किसी संगीत के, गाता है बिना किसी शब्द के। यह प्रेम का उन्माद है।
"तेजपुंज" — दिव्य ज्योति
"तेजपुंज" — यह शब्द "तेज" (प्रकाश) और "पुंज" (समूह) से बना है। संत-साहित्य में यह परमात्मा की दिव्य ज्योति का प्रतीक है। जब साधक आंतरिक ध्यान में गहरा उतरता है, तो उसे एक अद्भुत प्रकाश का दर्शन होता है। यह प्रकाश न तो सूर्य का है, न चाँद का, न बिजली का। यह एक शांत, स्थिर, मधुर प्रकाश है जो सब कुछ प्रकाशित करता है और फिर भी किसी की आँखों में चुभता नहीं।
"तुरिया-पद" — चेतना की चौथी अवस्था
"तुरिया" शब्द मंडूक्य उपनिषद से आता है। इस उपनिषद में चेतना की चार अवस्थाएँ बताई गई हैं — जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरिया। तुरिया इन तीनों से परे है। यहाँ साधक पूरी तरह जागृत है, लेकिन शरीर, मन और बुद्धि — सब शांत हैं। यह आत्मज्ञान की अवस्था है, परम शांति की अवस्था है।
संत चरनदास जी कह रहे हैं कि वे "दिन रैन, नित" — दिन-रात, निरंतर — इस अवस्था में रहते हैं। यह कोई एक बार का अनुभव नहीं, बल्कि एक स्थायी अवस्था है।
जीवनोपयोगी शिक्षाएँ
1. प्रेम ही परिवर्तन का मूल है
इस भजन से एक बात स्पष्ट होती है — जीवन में वास्तविक परिवर्तन केवल ज्ञान से नहीं, प्रेम से आता है। गुरु ने प्रेम पिलाया, और उसी प्रेम से "पलटो भयो"। यदि हम अपने जीवन में परिवर्तन चाहते हैं, तो हमें प्रेम की आवश्यकता है — प्रेम गुरु का, प्रेम ईश्वर का, प्रेम सत्य का।
2. असली अभिमान मिटाना
"कुल गोत नसायो" — यह सिर्फ जाति या वंश का अभिमान नहीं, बल्कि सारा अहंकार है। जब गुरु का प्रेम मिलता है, तो हमें पता चलता है कि हम कुछ नहीं हैं। जो कुछ है, वह उसी का है। यह अभिमान-मोचन आध्यात्मिक विकास की पहली सीढ़ी है।
3. बाहरी कर्मकांड से आंतरिक अनुभूति तक
"सब किरिया सही छूटी" — यहाँ यह संदेश नहीं है कि कर्मकांड बुरे हैं। बल्कि यह संदेश है कि कर्मकांड एक साधन हैं, लक्ष्य नहीं। जब आंतरिक अनुभूति हो जाती है, तो साधन की ज़रूरत कम हो जाती है। लेकिन यह तभी होता है जब अनुभूति वास्तविक हो। कृत्रिम रूप से कर्मकांड छोड़ना नहीं, बल्कि अनुभूति के बाद स्वाभाविक रूप से मुक्त होना — यही सच्ची मुक्ति है।
4. त्रिगुणों से परे जाना
संसार में हम सत्त्व, रज और तम — इन तीनों गुणों के प्रभाव में रहते हैं। कभी सात्विकता आती है, कभी उत्साह, कभी आलस्य। लेकिन जब साधक त्रिगुणों से ऊपर पहुँचता है, तो वह इन उतार-चढ़ावों से मुक्त हो जाता है। यह एक ऐसी अवस्था है जहाँ न सुख से अधिक आनंद होता है, न दुःख से पीड़ा। केवल एक शांत, स्थिर आनंद रहता है।
भजन का गूढ़ संदेश
इस भजन का सबसे गूढ़ संदेश यह है कि आध्यात्मिक यात्रा एक आंतरिक यात्रा है। यह कोई बाहरी तीर्थ नहीं, कोई बाहरी कर्मकांड नहीं, कोई बाहरी उपदेश नहीं। यह एक यात्रा है जो गुरु के प्रेम से शुरू होती है और आत्मा के परमात्मा में विलीन होने तक पहुँचती है।
संत चरनदास जी ने इस भजन में अपने पूरे आध्यात्मिक अनुभव को समेट दिया है। वे हमें बता रहे हैं कि यह सब संभव है — "रतनदास दिन रैन, नित तुरिया-पद पायो हो"। यह कोई अदृश्य, अनंत कालीन लक्ष्य नहीं। यह एक ऐसी अवस्था है जिसे "दिन रैन" — निरंतर — जीया जा सकता है।
अंतिम चिंतन
जब मैं इस भजन को पढ़ता हूँ, तो मुझे वही गाँव का मेला याद आता है, वही बुजुर्ग साधक, वही धूप वाली दोपहर। और मुझे लगता है कि संत चरनदास जी ने जो लिखा, वह केवल शब्द नहीं हैं। वह एक अनुभव है, एक यात्रा है, एक आमंत्रण है।
गुरु हमरे प्रेम पियायो हो...
यह आमंत्रण आज भी खुला है। यह आमंत्रण हर उस हृदय के लिए है जो थक चुका है संसार की दौड़ से, जो प्यासा है सच्चे प्रेम का, जो खोज रहा है अपने आपको।
और जब यह प्रेम मिलता है, तो सब कुछ बदल जाता है। "पलटो भयो" — जीवन पलट जाता है। "कुल गोत नसायो" — सारा अभिमान मिट जाता है। "अलम चढ़ो" — मस्ती चढ़ती है। "अनहद मन छायो" — दिव्य ध्वनि गूँजने लगती है। "तेजपुंज की सेज पे प्रीतम गल लायो" — और अंत में, प्रीतम अपने गले लगा लेता है।
यही तो है आध्यात्मिक यात्रा का अंत — न कि किसी स्वर्ग में जाना, न किसी मोक्ष में जाना। बल्कि प्रीतम के गले लग जाना। और फिर "दिन रैन, नित तुरिया-पद पायो" — निरंतर उसी अवस्था में रहना।
जैसा कि मेरे दादाजी कहा करते थे — "बेटा, भजन गाने से पहले समझ लेना। लेकिन समझने के बाद भूल जाना। क्योंकि असली भजन तो यहाँ गाया जाता है" — और वे अपने हृदय पर हाथ रखते थे।
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