।।गुरु महिमा श्लोक।।
गुकारस्त्वन्धकारस्तु रुकारस्तेज उच्यते।
अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः॥
।। Guru Mahima Shlok ।।
Gukaarastvandhakaarastu, Rukaarasteja uchyate।
Agyaan-graasakam Brahma, Gurureva na sanshayah॥
गुकारस्त्वन्धकारस्तु — 'गु' का अर्थ अंधकार। पर यह बाहरी रात नहीं, वह अंधेरा जो मन के भीतर बैठा है। माया ने इसे इतना घना कर दिया है कि आत्मा अपने को भूलकर संसार में खो गई। संतमत में इसे 'मूल भ्रांति' कहते हैं — जैसे सर्प रज्जू में भ्रम। गुरु इस अंधकार को नहीं बस रोशनी देते, वे भ्रम को ही तोड़ देते हैं। यह फर्क है — रोशनी से अंधेरा दूर होता है, पर गुरु-कृपा से अंधेरा था ही नहीं, यह समझ आती है।
रुकारस्तेज उच्यते — 'रु' का अर्थ तेज। पर यह कोई बाहरी दीपक नहीं, वह प्रकाश जो आत्म-बोध में जल उठता है। कबीर साहब की बानी में वह 'ज्योति' है जो 'अंतर' में जलती है। यह तेज गुरु से मिलता है — पर मिलता कैसे? शब्द-दान से, दृष्टि-दान से, उस क्षण से जब गुरु की सूरत शिष्य की सूरत में समा जाती है। यहाँ गुरु केवल उपदेशक नहीं, वे आत्म-ज्ञान के प्रकाशक हैं।
अज्ञानग्रासकं ब्रह्म — 'ग्रासक' शब्द सोचने लायक है। गुरु अज्ञान को नहीं मिटाते, उसे 'खा' जाते हैं — जैसे अग्नि लकड़ी को। यह ब्रह्म ही कर सकता है, क्योंकि ब्रह्म और अज्ञान एक साथ नहीं रह सकते। जैसे सूर्य उगते ही अंधेरा अपने आप हट जाता है, वैसे ही गुरु के रूप में ब्रह्म के प्रकाश से अज्ञान का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। कभी यह कृपा एक क्षण में घटित होती है, और कभी वर्षों की साधना के बाद उसका अनुभव होता है।
गुरुरेव न संशयः — 'न संशयः' — इसमें पूर्ण निश्चय है। पर यह निश्चय बुद्धि से नहीं, अनुभव से आता है। जब एक बार गुरु-कृपा का स्वाद चख लिया, फिर शंका का कोई स्थान नहीं। गुरु नानक देव जी की बानी में 'एक ओंकार' की अनुभूति यही है — जहाँ द्वैत मिट जाता है, वहाँ गुरु और ब्रह्म में भेद नहीं रहता। गुरु ब्रह्म हैं, यह न केवल मानना है, जीना है।
चिंतन — यह श्लोक पढ़ते हुए लगता है कि हम सब उस मछली की तरह हैं जो पानी में रहकर प्यासी है। गुरु वह हैं जो मछली को बताते हैं — 'तू पानी में है, प्यास नहीं, भ्रम है।' पर यह बताना भी आसान नहीं, क्योंकि मछली की पूरी जिंदगी पानी में ही बीती है। गुरु-कृपा वह क्षण है जब मछली एक पल के लिए पानी से बाहर झाँकती है, और फिर समझ आती है कि 'मैं' और 'पानी' अलग नहीं। यह कोई सिद्धांत नहीं, बस एक भाई की तरह कह रहा हूँ — जो रास्ते पर मिला, उसने भी यही अनुभव किया है।
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