गुरु कृपा स्तुति | यस्य देवे परा भक्तिः श्लोक का अर्थ, गुरु महिमा एवं गुरु पूर्णिमा विशेष

।।गुरु कृपा स्तुति।।

यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥

।। Guru Kripa Stuti ।।

Yasya deve paraa bhaktih, yathaa deve tathaa gurau।
Tasyaitae kathitaa hyarthaah, prakaashante mahaatmanah॥

यस्य देवे परा भक्तिः — संस्कृत व्याकरण से 'परा' का अर्थ है 'उच्चतम, परम'। शास्त्रीय भाष्य में 'देवे' का अर्थ ईश्वर या परमात्मा होता है। पर यहाँ एक सूक्ष्म विवेक चाहिए। "संतमत की कुछ धाराएँ 'देव' को अंतर के नाम या शब्द के रूप में भी देखती हैं।" गुरु नानक देव जी की बानी में 'एक ओंकार' की अनुभूति यही है — जहाँ देव और दास का भेद मिट जाता है। परा भक्ति वह है जहाँ भक्ति करने वाला भी नहीं बचता, केवल भक्ति रह जाती है। यह वह बिंदु है जहाँ सूरत अपने स्रोत में समा जाती है।
यस्य देवे परा भक्तिः श्लोक अर्थ | गुरु महिमा और गुरु कृपा का रहस्य

यथा देवे तथा गुरौ — 'यथा' का अर्थ 'जैसा-वैसा'। शास्त्रीय अर्थ में यह समानता का सूचक है। पर संतमत इसे एक कदम आगे ले जाता है। गुरु और देव में समानता नहीं, अभेद है। कबीर साहब की एक पदावली में वह क्षण आता है जब शिष्य को समझ आती है कि गुरु ही वह द्वार हैं जहाँ से देव दिखाई देता है। यह कोई तर्क नहीं, अनुभव है। जब सत्संग में बैठकर नाम सुनते हैं, तो कभी-कभी लगता है कि जो बोल रहा है और जो सुन रहा है, दोनों एक ही चेतना के दो पहलू हैं। गुरु इस अभेद को प्रकट करते हैं — वे आत्म-बोध के प्रकाशक हैं, केवल उपदेशक नहीं।

तस्यैते कथिता ह्यर्थाः — 'एते अर्थाः' — ये अर्थ, ये तत्त्व जो शास्त्रों में कहे गए हैं। भाष्यकार इन्हें वेदांत के सिद्धांत मानते हैं। पर संतमत में ये अर्थ जीवित होते हैं केवल तब जब गुरु-कृपा से शिष्य की सूरत जागती है। गरीबदास जी की बानी में आता है — 'ज्ञान बिना ज्ञानी नहीं, गुरु बिना ज्ञान नहीं।' ये अर्थ किताबों में सोए रहते हैं, गुरु की सूरत उन्हें जगा देती है। यहाँ 'कथित' शब्द में एक विडंबना है — कहे गए हैं, पर कहने वाले तक पहुँचना अलग बात है।

प्रकाशन्ते महात्मनः — 'प्रकाशन्ते' का मूल 'प्रकाश' से है — प्रकट होना, प्रकाशित होना। 'महात्मनः' वह महान आत्मा जिसमें यह प्रकाश स्वाभाविक हो जाता है। पर यह प्रकाश बाहरी दीपक का नहीं, अपने भीतर जलती हुई ज्योति का है। सुंदरदास जी की बानी में वह 'सहज' अवस्था है जहाँ साधना भी सहज हो जाती है। महात्मा वह नहीं जो लोगों में बड़ा माना जाता है, वह है जिसने अपने को छोटा कर लिया है — इतना छोटा कि गुरु की कृपा उसमें ठहर सके।

चिंतन — यह श्लोक पढ़ते हुए याद आता है कि कितने वर्षों तक मैंने 'देव' और 'गुरु' को अलग-अलग खोजा। मंदिर गया, तीर्थ गया, ग्रंथ पढ़े। पर वह अनुभव जो सत्संग की एक शाम में मिला, वह कहीं और नहीं मिला। शायद इसीलिए संत-साहित्य में 'खोज' शब्द का प्रयोग कम होता है — 'लहर' ज्यादा। लहर समुद्र में ही रहती है, खोजने वाला बाहर दौड़ता है। गुरु वह हैं जो लहर को समुद्र की याद दिला देते हैं। पर यह याद भी क्षणभंगुर है — फिर से लहर उठती है, फिर से 'मैं' का भान होता है। तब लगता है कि यह साधना का रास्ता नहीं, बार-बार भूलने और याद करने का रास्ता है। और हर बार याद करने पर गुरु वहीं खड़े मिलते हैं। क्या यह आश्रय है, या फिर एक ऐसा सच जिसे हम जानबूझकर भूल जाते हैं — शायद इसीलिए कि फिर से याद करने का आनंद ले सकें?

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