कुछ भजन ऐसे होते हैं जिन्हें हम सुनते हैं, गुनगुनाते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन कुछ भजन ऐसे भी होते हैं जो सुनने के बाद मन में ठहर जाते हैं। वे बार-बार भीतर से पुकारते हैं, जैसे कोई पुराना परिचित धीरे से याद दिला रहा हो कि तुम कुछ भूल गए हो। संत उमारामजी का यह भजन — "प्यारी ए! ले सतगुरु की सार" — ऐसी ही वाणी है।
"टूटत छूटत फन्द, निरत निरबन्ध है।
"जाति न पांति न भांति, रूप नहीं रंग है।
"नैन बैन बिन सैन, अगोचर जाण है।
पहली बार जब मैंने इस भजन को सुना, तो इसके शब्द सरल लगे, लेकिन अर्थ कहीं अधिक गहरे थे। विशेषकर "सतगुरु की सार" और "सैन" जैसे शब्द मन में प्रश्न छोड़ गए। बाद में जब संत-वाणी, कबीर, दादू और अन्य संतों की रचनाएँ पढ़ीं, तो समझ आया कि यह भजन केवल उपदेश नहीं देता, बल्कि साधक को भीतर देखने की दिशा दिखाता है। यह बाहरी आडंबरों, पहचानों और विचारों से हटाकर उस सत्य की ओर संकेत करता है जो हमेशा से हमारे भीतर मौजूद है।
संत उमारामजी की वाणी की विशेषता यही है कि वे जटिल दर्शन को भी सहज शब्दों में कह देते हैं। इस भजन में वे किसी कर्मकांड, व्रत या बाहरी साधना की चर्चा नहीं करते। वे केवल इतना कहते हैं कि सतगुरु के दिए हुए सार को धारण करो, उसे निहारो, उसके संकेत को समझो। फिर धीरे-धीरे वे बंधनों के टूटने, भेदों के मिटने और उस अखण्ड सत्य के अनुभव की बात करते हैं जो न आँखों से दिखाई देता है और न शब्दों में पूरी तरह कहा जा सकता है।
यह भजन वास्तव में एक आध्यात्मिक यात्रा का संक्षिप्त मानचित्र है — सतगुरु की सार से शुरू होकर अगोचर सत्य की पहचान तक। आइए, अब इस वाणी को संतमत की दृष्टि से समझने का प्रयास करें।
भजन पाठ
प्यारी ए! ले सतगुरु की सार, धार कर निहार है।
देखत पेखत सैन, समझ भव पार है॥
टूटत छूटत फन्द, निरत निरबन्ध है।
खण्डत नहीं अखण्ड, लगे नहीं दण्ड है॥
जाति न पांति न भांति, रूप नहीं रंग है।
गम नहीं अगम अखेद, अटल अणभंग है॥
नैन बैन बिन सैन, अगोचर जाण है।
"उमाराम" लख जाण, कही परवाण है॥
Bhajan Path (Hinglish)
Pyaari e! Le Satguru ki saar, dhaar kar nihaar hai।
Dekhat pekhat sain, samajh bhav paar hai॥
Tootat chhootat phand, nirat nirbandh hai।
Khandat nahin akhand, lage nahin dand hai॥
Jaati na paanti na bhaanti, roop nahin rang hai।
Gam nahin agam akhed, atal anabhang hai॥
Nain bain bin sain, agochar jaan hai।
"Umaram" lakh jaan, kahi parvaan hai॥
विचार-चिंतन
सार को धारण करना
"प्यारी ए! ले सतगुरु की सार, धार कर निहार है।"
इस भजन की शुरुआत में संत उमारामजी 'प्यारी' कहकर सम्बोधित करते हैं। यहाँ 'प्यारी' कोई रूप-सौंदर्य या बाहरी आकर्षण नहीं, बल्कि वह जीवात्मा है जो प्रभु-प्रेम में लीन हो चुकी है। जैसे कबीर साहब ने कहा है — "जब ही सत्य नाम रट लीना, तब ही तू साधु की सीना।" वही साधक जो सत्य की खोज में निकला है, वही इस सम्बोधन का वास्तविक अधिकारी है।
'सार' शब्द सुनने में सरल लगता है, पर इसमें गहराई है। संतमत में 'सार' केवल कोई उपदेश या सिद्धांत नहीं — यह वह परम तत्व है जो गुरु अपने शिष्य के हृदय में स्थापित करते हैं। संत-साहित्य में "सार" शब्द अनेक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। कहीं यह गुरु-वचन का संकेत है, कहीं नाम का, कहीं आत्मज्ञान का, और कहीं उस परम तत्व का जो समस्त साधना का निष्कर्ष है।
संत उमाराम जी ने यहाँ "सतगुरु की सार" कहा है। इसलिए इसका अर्थ केवल किसी एक शब्द या मंत्र तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह वह आंतरिक तत्व है जिसे गुरु शिष्य के भीतर जाग्रत करते हैं। संत परंपरा में इसे नाम, शब्द, आत्मबोध या तत्वज्ञान — किसी भी रूप में समझा जा सकता है।
'धार कर' का अर्थ केवल मान लेना नहीं। धारण करना अर्थात् अपने जीवन में उतारना। कई बार हम सुन तो लेते हैं, पर सुनना और धारण करना में जमीन-आसमान का अंतर है। जैसे बीज को बोना और उसे अंकुरित होकर वृक्ष बनने देना — दोनों अलग बातें हैं। गुरु-शिष्य परंपरा में यह 'धारण' ही मुख्य है। गुरु देते हैं, शिष्य ग्रहण करता है, और फिर उसे अपने भीतर इतना गहरा करता है कि वह उसकी सांस बन जाए।
'निहार' — यह शब्द बड़ा सूक्ष्म है। निहारना अर्थात् भीतर देखना, अंतर्मुखी होकर उस सार को देखना जो बाहर नहीं दिखता। दादू दयाल जी ने कहा — "देखो रे भाई, अपने भीतर।" यही निहार है। जब साधक अपनी आँखें बंद करके भीतर की ओर मुड़ता है, तभी उसे वह दिखाई देता है जो आँखों से नहीं देखा जा सकता।
सैन और भव-पार
"देखत पेखत सैन, समझ भव पार है॥"
यहाँ 'देखत पेखत' का अर्थ केवल देखना नहीं। संतमत में 'देखना' अनुभव का पर्याय है। जब कबीर साहब कहते हैं "देखा नहीं तो क्या देखा" — तो वे बाहरी दृश्य की बात नहीं कर रहे। वे उस आंतरिक दर्शन की बात कर रहे हैं जो शब्द-योग या सुरत-शब्द योग से होता है।
'सैन' शब्द बड़ा रहस्यमय है। यह संकेत है, इशारा है, वह सूक्ष्म शिक्षा जो शब्दों में नहीं कही जा सकती। गुरु-शिष्य परंपरा में अक्सर ऐसा होता है कि गुरु की एक झपकी, एक हाव-भाव, एक नज़र — और शिष्य का काम हो जाता है। मीराबाई ने जब रविदास जी से मिलीं, तो क्या उन्होंने कोई लंबा उपदेश सुना? नहीं। वह 'सैन' था जिसने मीरा को पूरी तरह बदल दिया।
'समझ भव पार' — यहाँ 'समझ' का अर्थ केवल बौद्धिक समझ नहीं। यह वह समझ है जो अनुभव से आती है। जैसे किसी ने समुद्र तैरकर पार किया हो — उसकी समझ और जिसने केवल नक्शे में देखा हो — दोनों में अंतर है। 'भव पार' अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति। संतमत में यह मुक्ति कोई बाहरी स्थान पर जाना नहीं, बल्कि उस सत्य को जान लेना है जो कभी जन्मा नहीं और कभी मरेगा नहीं।
बंधनों का टूटना
"टूटत छूटत फन्द, निरत निरबन्ध है।
खण्डत नहीं अखण्ड, लगे नहीं दण्ड है॥"
यहाँ एक सुंदर चित्रण है। 'फन्द' अर्थात् जाल, फंदा, जो शिकारी जानवरों को पकड़ने के लिए बिछाया जाता है। संतमत में ये फंदे माया के हैं — काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार। हम इन फंदों में इतने उलझे हैं कि हमें पता ही नहीं चलता कि हम बंधे हुए हैं। जैसे मछली जाल में फँसी हो तो उसे पता नहीं चलता कि वह फँसी है, वह तो केवल पानी में तैर रही है।
'टूटत छूटत' — यह क्रम बड़ा महत्वपूर्ण है। पहले फंदा टूटता है, फिर छूटता है। संतमत में जब सुरत (चेतना) शब्द में लगती है, तो पहले माया के बंधन कमज़ोर होते हैं, फिर एक-एक करके टूटते हैं, और फिर पूरी तरह छूट जाते हैं। यह कोई एकाएक नहीं होता — यह एक प्रक्रिया है, साधना है।
'निरत' और 'निरबन्ध' — यहाँ एक शब्द-युक्ति है। 'निरत' अर्थात् सुरत की वह अवस्था जब वह परमात्मा में लीन हो जाती है। और 'निरबन्ध' अर्थात् बंधन-रहित। जब सुरत अपने स्रोत में मिल जाती है, तो सारे बंधन अपने आप छूट जाते हैं। यह वह अवस्था है जिसे सहज अवस्था कहते हैं। सहजो बाई ने इस अवस्था का वर्णन किया है — जहाँ कोई कृत्रिमता नहीं, कोई दिखावा नहीं, केवल सहज भाव है।
संतमत की विभिन्न परंपराओं में "सुरत" और "निरत" दोनों शब्दों का विशेष महत्व है।
कुछ संतमत परंपराएँ सुरत को चेतना की देखने वाली शक्ति और निरत को सुनने या ग्रहण करने वाली शक्ति मानती हैं। वहीं अन्य परंपराओं में निरत का अर्थ परम तत्व में लीन हुई चेतना भी माना गया है।
संत उमाराम जी के इस पद में "निरत निरबन्ध" का अर्थ ऐसी चेतना से लिया जा सकता है जो सभी बंधनों से मुक्त होकर अपने मूल स्रोत में स्थित हो गई है।
'खण्डत नहीं अखण्ड' — यह संतमत का केंद्रीय सिद्धांत है। जो सत्य है वह कभी खंडित नहीं होता। हमारी आत्मा को हम टुकड़ों में देखते हैं — यह मेरा शरीर, मेरा मन, मेरी बुद्धि। पर जब सच्ची दृष्टि आती है, तो पता चलता है कि यह सब एक ही अखंड चेतना के प्रकाश हैं। जैसे सूर्य की किरणें अलग-अलग लगती हैं, पर सब एक सूर्य से आती हैं।
अखण्ड — भारतीय दर्शन में "अखण्ड" शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। उपनिषद बार-बार उस चेतना की चर्चा करते हैं जो विभाजित नहीं होती, यद्यपि संसार में अनेकता के रूप में दिखाई देती है।
जिस प्रकार समुद्र एक है, पर उसकी लहरें असंख्य दिखाई देती हैं, उसी प्रकार आत्मा और परमात्मा का सत्य अखण्ड है। संत उमाराम जी का "खण्डत नहीं अखण्ड" इसी अनुभव की ओर संकेत करता प्रतीत होता है।
'लगे नहीं दण्ड' — जब आत्मज्ञान हो जाता है, तो कर्मफल का दंड नहीं लगता। यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि यह कोई कानून तोड़ने की बात नहीं। बल्कि जब साधक उस अखंड सत्य को जान लेता है जो कर्म करता ही नहीं, तो फिर कर्मफल किसे लगे? जैसे सपने में हमने पाप किया या पुण्य किया — जागने पर हमें उसका फल नहीं मिलता। इसी तरह, जब आत्मबोध होता है, तो यह सब माया का खेल समझ में आता है।
भेदों से परे
"जाति न पांति न भांति, रूप नहीं रंग है।
गम नहीं अगम अखेद, अटल अणभंग है॥"
यहाँ संत उमारामजी उस अवस्था का वर्णन कर रहे हैं जो आत्मज्ञान के बाद आती है। 'जाति न पांति' — जाति, कुल, वंश — ये सब बाहरी पहचानें हैं। गुरु नानक देव जी ने कहा — "न कोई ब्राह्मण न खत्री" — आत्मा के स्तर पर ये सब भेद मिट जाते हैं। रैदास जी ने भी यही कहा — "ऐसी जाति निरंजन की, जहाँ जाति न पांति।"
'रूप नहीं रंग' — जब भीतर का सत्य दिखाई देता है, तो बाहरी रूप-रंग का मोह टूट जाता है। यह नहीं कि रूप-रंग गायब हो जाते हैं, बल्कि उनका प्रभाव नहीं रहता। जैसे कोई बच्चा खिलौनों से खेलता है, पर जब बड़ा हो जाता है तो उसी खिलौने को देखकर मुस्कुराता है — वह मोह नहीं रहता।
'गम नहीं अगम' — यह बड़ा गहरा शब्द है। 'गम' अर्थात् जहाँ पहुँचा जा सके, और 'अगम' अर्थात् जहाँ पहुँचा न जा सके। परम सत्य अगम है — इंद्रियों से, मन से, बुद्धि से परे। फिर भी वह सबसे निकट है, क्योंकि वह हमारा स्वयं का सत्य है। जैसे आँखें सब कुछ देख सकती हैं पर खुद को नहीं देख सकतीं — फिर भी आँखें ही हैं।
'अखेद' — जिसमें कोई खेद नहीं, कोई दुःख नहीं। यह संसार में रहते हुए भी संसार से परे रहने की अवस्था है। दादू दयाल जी ने कहा — "दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय।" पर जब अखेद अवस्था आती है, तो दुःख-सुख दोनों एक समान लगते हैं।
'अटल अणभंग' — अटल अर्थात् जो कभी डिगे नहीं, और अणभंग अर्थात् जो कभी टूटे नहीं। यह परमात्मा की शाश्वत सत्ता का वर्णन है। चारों युग बीत जाएँ, ब्रह्मांड बदल जाए, पर यह सत्य वैसा ही रहता है। चरनदास जी ने कहा — "अनंत कोटि ब्रह्मांड का, एक रति नहीं भार।" यही वह अटल-अणभंग सत्य है।
संत परंपरा और सामाजिक समता — मध्यकालीन संत परंपरा का एक महत्वपूर्ण योगदान सामाजिक भेदभाव का विरोध था। कबीर, रैदास, दादू, नामदेव और अनेक संतों ने जाति-आधारित श्रेष्ठता को चुनौती दी।
संत उमाराम जी की यह पंक्ति केवल आध्यात्मिक सत्य नहीं कहती, बल्कि यह उस संत-परंपरा की प्रतिध्वनि भी है जिसमें मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, बल्कि चेतना और आचरण से होती है।
अगोचर का ज्ञान
"नैन बैन बिन सैन, अगोचर जाण है।
"उमाराम" लख जाण, कही परवाण है॥"
यहाँ संत उमारामजी उस सत्य का वर्णन कर रहे हैं जो 'नैन बैन बिन' है — न आँखों से दिखाई देता है, न शब्दों में कहा जा सकता है। यह ताओ तेई चिंग का वही सिद्धांत है जो कहता है — "जो कहा जा सकता है वह सच्चा ताओ नहीं।" पर संतमत में यह और भी गहरा है।
'अगोचर' — जो इंद्रियों की पहुँच से परे है। फिर भी यह 'जाण' अर्थात् जाना जा सकता है। कैसे? आत्मानुभव द्वारा। जैसे किसी ने कभी शहद न चखा हो, तो हम उसे शहद का स्वाद शब्दों में नहीं बता सकते। पर जब वह स्वयं चखता है, तो उसे पता चल जाता है। इसी तरह, परम सत्य को केवल अनुभव द्वारा जाना जा सकता है।
अंत में संत उमारामजी अपना नाम लेते हैं — '"उमाराम" लख जाण'। यहाँ वे कह रहे हैं कि मैंने इसे जान लिया है, पहचान लिया है। और यह 'कही परवाण' — यह मेरा अनुभव है, यह मेरी साक्षी है। संतमत में यह बड़ा महत्वपूर्ण है। केवल सुनने या पढ़ने से नहीं, बल्कि अपने अनुभव से प्रमाणित करना। जैसे कबीर साहब ने कहा — "कहत कबीर सुनो भाई साधो, मैंने तो अपने गुरु से यही सीखा।"
संतमत में एक मूलभूत सिद्धांत है कि परम सत्य का अनुभव किया जा सकता है, लेकिन उसे पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता।
इसी कारण संत साहित्य में बार-बार "गूंगे का गुड़", "अकथ कथा", "अनुभव गम्य" जैसे शब्द मिलते हैं। संत उमाराम जी का "नैन बैन बिन सैन" भी उसी दिशा की ओर संकेत करता है — जहाँ सत्य शब्दों से नहीं, अनुभव से जाना जाता है।
संतमत की दृष्टि से केंद्रीय संदेश
इस भजन में संत उमारामजी एक बात स्पष्ट कर रहे हैं — सतगुरु का दिया हुआ 'सार' यदि साधक अपने हृदय में धारण कर ले, तो उसकी सारी यात्रा का अंत एक ही जगह है — वह अखंड, अगम, अविनाशी परम सत्य जहाँ सारे भेद मिट जाते हैं। यह कोई बाहरी स्थान नहीं, बल्कि हमारे अपने भीतर का सत्य है।
गुरु-शिष्य परंपरा में यह 'सार' गुरु कृपा से मिलता है। यह कोई बाज़ार की वस्तु नहीं जो माँगने से मिल जाए। यह उस प्रेम का फल है जो गुरु और शिष्य के बीच होता है। जैसे माँ का दूध बच्चे को मिलता है — कोई माँग नहीं, केवल प्रेम और आवश्यकता।
गुरु का सार → भीतर की दृष्टि → बंधनों से मुक्ति → अखण्ड सत्य का अनुभव → भेदों का लोप → अगोचर की अनुभूति।
संत उमाराम जी साधना की किसी जटिल पद्धति का वर्णन नहीं करते। वे बार-बार साधक को भीतर लौटने की प्रेरणा देते हैं। भजन का केंद्र बाहरी आचरण नहीं, बल्कि आंतरिक जागृति है।
अंतिम विचार
संत उमाराम जी का यह भजन केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि साधना का निमंत्रण है। इसमें कोई जटिल दर्शन नहीं, कोई कठिन तर्क नहीं — केवल एक सीधी पुकार है :
"सतगुरु की सार को धारण कर, भीतर देख।"
जब साधक सचमुच भीतर देखना शुरू करता है, तब उसे धीरे-धीरे अनुभव होता है कि जिस सत्य को वह बाहर खोज रहा था, वह तो सदैव उसके भीतर ही उपस्थित था।
शायद इसी कारण संतों ने बार-बार कहा —
"जिसे तू ढूँढ़े नगर-नगर, वह तेरे ही घर में है।"
और संत उमाराम जी की पूरी वाणी मानो इसी एक सत्य पर आकर ठहर जाती है —
सार बाहर नहीं मिलता, वह भीतर प्रकट होता है।
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