।।गुरु गीता का प्रसिद्ध श्लोक।।
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्।
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्॥
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्।
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि अहम्॥
।। Guru Gita Ka Prasiddh Shlok ।।
Brahmaanandam Parama Sukhadam Kevalam Gyaanamurtim।
Dvandvaateetam Gaganasadrisham Tattvamasyaadi Lakshyam॥
Ekam Nityam Vimalam Achalam Sarvadhee Saakshibhootam।
Bhaavaateetam Trigunarahitam Sadgurum Tam Namaami Aham॥
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं — 'ब्रह्मानंद' का मूल विश्लेषण है ब्रह्म + आनंद, वह आनंद जो ब्रह्म में स्थित है। शास्त्रीय भाष्य में 'परमसुखदं' का अर्थ है परम सुख का दाता। पर संतमत की दृष्टि में यह सुख बाहर से मिलने वाला नहीं, वह अनुभव है जिसमें सुख का अनुभव करने वाला भी सुख में समा जाता है। दादू दयाल जी की बानी में वह 'अनाहद नाद' है जो सूरत लगाने पर गूँज उठता है — यही ब्रह्मानंद की अनुभूति है। गुरु इस आनंद को प्रकट करते हैं, पर इसे 'देते' नहीं — वे शिष्य की आँखें खोल देते हैं जो इस आनंद को हमेशा से देख रही थीं, पर भूल गई थीं।
केवलं ज्ञानमूर्तिम् — 'केवल' का अर्थ एकमात्र, 'ज्ञानमूर्ति' वह रूप जो शुद्ध चेतना ही है। भाष्यकार इसे ब्रह्म के स्वरूप की उपमा देते हैं। पर संतमत में यहाँ एक गहरा संकेत है — गुरु केवल ज्ञान 'देने' वाले नहीं, वे ज्ञान के स्वरूप ही हैं। जैसे दीपक प्रकाश का स्वरूप है, वैसे ही गुरु आत्म-बोध का स्वरूप हैं। यह कोई उपमा नहीं, अनुभव है। जब शिष्य की सूरत गुरु की सूरत में लगती है, तब यह भेद मिट जाता है कि 'मैं जान रहा हूँ' और 'गुरु बता रहे हैं'।
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं — 'द्वन्द्वातीत' का मूल विश्लेषण है द्वन्द्व + अतीत, जो सुख-दुख, लाभ-हानि, मान-अपमान से परे है। 'गगनसदृश' आकाश के समान, जो सब कुछ भरा हुआ होते हुए भी कुछ ग्रहण नहीं करता। संतमत में यह 'सहज' की अवस्था है — जहाँ विवेक इतना पक्का हो जाता है कि माया के द्वन्द्व स्वतः ही निरस्त हो जाते हैं। गुरु नानक देव जी की बानी में 'सहज' वही धरती है जहाँ नाम का बीज अंकुरित होता है। गुरु इस आकाश की तरह हैं — सब कुछ देखते हैं, पर कुछ भी उनमें अंकुरित नहीं होता।
तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् — 'तत्त्वमसि' वह महावाक्य है जो छांदोग्य उपनिषद् से आता है — 'तू वह है'। 'आदिलक्ष्य' का अर्थ है जो इस महावाक्य का लक्ष्य है, इसका अंतिम अर्थ। भाष्यकार इसे आत्मा और ब्रह्म के अभेद की ओर इशारा करते हैं। पर संतमत में यह 'लक्ष्य' कोई दूर की मंजिल नहीं, वह बिंदु है जहाँ शिष्य को समझ आता है कि 'मैं' जो खोज रहा था, वह 'मैं' ही था। गुरु इस लक्ष्य की ओर इशारा करते हैं — पर इशारा भी क्या, जब शिष्य की आँखें ही न खुलें। इसीलिए गुरु-कृपा की जरूरत है, वह कृपा जो आत्म-बोध का द्वार खोल देती है।
एकं नित्यं विमलमचलं — 'एकं' एक, 'नित्यं' शाश्वत, 'विमल' निर्मल, 'अचल' अचल। ये सब विशेषण ब्रह्म के लिए प्रयुक्त होते हैं। पर संतमत में ये विशेषण गुरु में इसलिए दिखाई देते हैं क्योंकि गुरु ने अपने को इस स्वरूप में स्थिर कर लिया है। यह स्थिरता कोई कठोरता नहीं, वह शांति है जो तूफान के बीच भी अपने केंद्र में रहती है। रैदास जी की बानी में वह 'बेगमपुर' इसी नित्यता का प्रतीक है — जहाँ कोई उतार-चढ़ाव नहीं, कोई आना-जाना नहीं।
सर्वधीसाक्षिभूतम् — 'सर्वधी' सब बुद्धियाँ, 'साक्षिभूत' साक्षी-स्वरूप। भाष्यकार इसे ब्रह्म के स्वरूप की उपमा देते हैं — जो सब कुछ देखता है पर कुछ भी नहीं है। संतमत में यह 'सूरत' की अवस्था है — जब ध्यान इतना गहरा हो जाता है कि सोचने वाला, सोच और सोचा जाने वाला, तीनों एक साक्षी में समा जाते हैं। गुरु इस साक्षी-भाव को प्रकट करते हैं। शिष्य जब अपने मन को देखता है, तो पाता है कि मन के पीछे कोई और है जो मन को देख रहा है — वही साक्षी, वही गुरु।
भावातीतं त्रिगुणरहितं — 'भावातीत' भावनाओं से परे, 'त्रिगुणरहित' सत्त्व-रजस-तमस से रहित। शास्त्रीय दर्शन में यह मुक्त पुरुष का लक्षण है। पर संतमत में यह कोई उपलब्धि नहीं, वह स्वाभाविक अवस्था है जो आत्म-बोध में प्रकट होती है। जब सूरत अपने मूल में लगती है, तो गुण अपने आप संतुलित हो जाते हैं — उन्हें 'छोड़ना' नहीं पड़ता, वे अपने आप 'भाव' बनकर रह जाते हैं। गुरु इस अवस्था को जीते हैं, और शिष्य को इसकी झलक देते हैं। यह झलक ही गुरु-कृपा है — एक बार देख लिया, फिर भूलना मुश्किल।
सद्गुरुं तं नमामि अहम् — 'सद्गुरु' वह गुरु जो सत्य के साथ एक हैं। 'नमामि' नमन करता हूँ, 'अहम्' मैं। यहाँ 'अहम्' शब्द में एक विडंबना है — जो नमन कर रहा है, वह 'मैं' भी है। पर संतमत में यह नमन उस क्षण का है जब 'मैं' नमन में पिघल जाता है। गुरु गीता में यही सार है — सद्गुरु को नमन करना अपने को सद्गुरु में समर्पित करना है। यह कोई क्रिया नहीं, वह अवस्था है जिसमें नमन करने वाला, नमन और नमन किया जाने वाला — तीनों एक हो जाते हैं।
चिंतन — यह श्लोक पढ़ते हुए याद आता है कि कितने वर्षों तक मैंने इन विशेषणों को मन में दोहराया — एक, नित्य, विमल, अचल। लगता था कि ये गुरु के बाहरी गुण हैं, जैसे किसी की ऊँचाई या रंग। पर एक सत्संग की रात जब सब सो गए थे और मैं अकेला बैठा था, तो अचानक लगा कि ये विशेषण मेरे भीतर भी कहीं गूँज रहे हैं। शायद इसीलिए गुरु को 'ज्ञानमूर्ति' कहा गया — वे मूर्ति नहीं, वे वह दर्पण हैं जिसमें अपना चेहरा देख लिया। पर यह दर्पण भी धूल से ढका रहता है — माया की धूल, मोह की धूल। साधना इस धूल को हटाने का प्रयास नहीं, बल्कि यह समझ है कि धूल के नीचे दर्पण साफ ही है। कभी-कभी सोचता हूँ — क्या यह सब मैं समझ पा रहा हूँ, या यह समझ भी मुझमें कहीं पहले से मौजूद थी, बस गुरु की सूरत ने उसे जगा दिया? शायद दोनों एक ही बात हैं। या शायद, सवाल पूछना ही इस समझ का पहला संकेत है।
