कई बार जीवन में ऐसी घड़ी आती है जब बाहर से सब कुछ ठीक दिखाई देता है, लेकिन भीतर एक अनकही बेचैनी बनी रहती है। मन अपने कामों में लगा रहता है, संसार की दौड़ भी चलती रहती है, फिर भी कहीं न कहीं लगता है कि कुछ छूट गया है। संत ब्रह्मानंद जी का यह भजन ऐसी ही आंतरिक प्यास की बात करता है।
यह केवल गुरु-महिमा का गीत नहीं, बल्कि उस साधक की हृदय-कथा है जिसे सतगुरु का सान्निध्य मिल गया और जिसकी वर्षों पुरानी मानसिक तपन शांत हो गई। इस भजन में संसार की भूलभुलैया भी है, मन की भटकन भी, गुरु-ज्ञान की आवश्यकता भी और आत्मा की मुक्ति का मार्ग भी। संत ब्रह्मानंद जी अपनी सरल भाषा में हमें बताते हैं कि जीवन का वास्तविक परिवर्तन तब शुरू होता है जब गुरु केवल बाहर नहीं मिलते, बल्कि उनका दिया हुआ ज्ञान भीतर जाग उठता है।
"मुझे सतगुरु संत मिलाय सखी।
"आन बसी बोरन की नगरिया।
"झूठे कार विहार जगत के।
"बिन गुरु ज्ञान मोक्ष नहिं होवै।
"ब्रह्मानंद मिले गुरु पूरा।
भजन पाठ
मुझे सतगुरु संत मिलाय सखी।
मेरे मन की तपत बुझाय सखी॥
आन बसी बोरन की नगरिया।
खोस खोस कर खाय सखी॥
झूठे कार विहार जगत के।
विरथा रही फसाय सखी॥
बिन गुरु ज्ञान मोक्ष नहिं होवै।
कोटिन जतन कराय सखी॥
ब्रह्मानंद मिले गुरु पूरा।
भवबंधन मिट जाय सखी॥
Bhajan Path (Hinglish)
Mujhe Satguru sant milaay sakhi।
Mere man ki tapat bujhaay sakhi॥
Aan basi boran ki nagariya।
Khos khos kar khaay sakhi॥
Jhoothe kaar vihaar jagat ke।
Virtha rahi phasaay sakhi॥
Bin Guru gyaan moksh nahin hovai।
Kotin jatan karaay sakhi॥
Brahmanand mile Guru poora।
Bhavbandhan mit jaay sakhi॥
विचार-चिंतन
सखी का विरह और गुरु की मिलन-कृपा
"मुझे सतगुरु संत मिलाय सखी।
मेरे मन की तपत बुझाय सखी॥"
यहाँ 'सखी' का प्रयोग बड़ा सूक्ष्म है। संत साहित्य में यह कोई बाहरी सहेली नहीं, बल्कि वह जीवात्मा है जो परमात्मा से बिछुड़कर विरह में जल रही है। मीराबाई ने भी अक्सर 'सखी' कहकर अपनी आत्मा को संबोधित किया — "सखी, मैं तो विहरुं जी के संग में।" वही आंतरिक सखी, वही बिछुड़ी हुई आत्मा यहाँ बोल रही है।
'सतगुरु संत' — यह संयुक्त संबोधन साधारण नहीं है। 'सतगुरु' वह हैं जो सत्य का मार्ग दिखाते हैं, और 'संत' वह हैं जो स्वयं उस सत्य में स्थित हैं। संतमत में यह भेद बड़ा महत्वपूर्ण है — केवल उपदेश देना अलग बात है, और स्वयं उस सत्य को जीना अलग। गुरु नानक देव जी ने कहा — "सतगुरु सूचा एक है, जिसु दीआ समझाए।" वही गुरु जो स्वयं सच्चे हैं और दूसरों को सच्चाई की समझ दे सकते हैं, वे 'सतगुरु संत' हैं।
'मिलाय' शब्द में एक गहरा आंतरिक अर्थ है। यह कोई बाहरी मुलाकात नहीं — यह आत्मिक संबंध की स्थापना है। जैसे दो नदियाँ मिलकर एक हो जाती हैं, वैसे ही जब गुरु की कृपा होती है, तो शिष्य की सुरत गुरु के शब्द में मिल जाती है। दादू दयाल जी ने इसे 'सुरत-शब्द मेल' कहा है। यह मेल बाहर नहीं, भीतर होता है।
'मन की तपत' — यह शब्द सुनते ही एक तस्वीर उभरती है। जैसे गर्मी में प्यासा आदमी पानी को तरसता है, वैसे ही आत्मा परमात्मा को तरसती है। यह 'तपत' कोई सांसारिक दुःख नहीं — यह वह आंतरिक बेचैनी है जो इस बात से होती है कि हम अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गए हैं। कबीर साहब ने कहा — "मन रे! क्यों भूल गया तू अपना आप?" यही भूल, यही विस्मृति, यही 'तपत' है।
मन की तपत केवल संसार की समस्याओं से पैदा नहीं होती। कई बार सब कुछ होते हुए भी भीतर खालीपन बना रहता है। धन है, परिवार है, सम्मान है, फिर भी मन में कोई अनकही प्यास बनी रहती है। संत इसी प्यास को आत्मा की तपत कहते हैं। यह वही आग है जो जीव को अपने मूल की खोज की ओर धकेलती है।
'बुझाय' — यह शांति अचानक नहीं आती। जब गुरु की कृपा से आत्मज्ञान का प्रकाश होता है, तो वह तपत धीरे-धीरे ठंडी होती है। जैसे कोई दीया जलता हो और हवा आकर उसे बुझा दे — नहीं, यहाँ उल्टा है। गुरु का ज्ञान वह दीया है जो भीतर की अंधेरी तपत को प्रकाश में बदल देता है।
बोरन की नगरिया
"आन बसी बोरन की नगरिया।
खोस खोस कर खाय सखी॥"
यहाँ एक बड़ा रहस्यमय चित्रण है। 'बोरन की नगरिया' — कुछ संत परंपराओं में 'बोरन' का अर्थ भ्रमित करने वाली शक्तियाँ हैं, पर मुझे लगता है कि यहाँ इसका अर्थ और भी सीधा है। 'बोरन' वे हैं जो बोर कर देते हैं, जो मूर्ख बना देते हैं, जो भ्रम में डाल देते हैं। और 'नगरिया' — यह हमारा अपना मन-मंदिर है, हमारा शरीर-रथ है।
'आन बसी' — यह बसावट धीरे-धीरे हुई है। कोई एकाएक नहीं आया। बचपन से ही — माँ-बाप ने सिखाया, समाज ने सिखाया, स्कूल ने सिखाया, टीवी ने सिखाया, फोन ने सिखाया। और धीरे-धीरे ये 'बोरन' हमारे मन में इतने गहरे बैठ गए कि हमें पता ही नहीं चला कि हम किसके घर में रह रहे हैं। जैसे कोई अपने ही घर में चोर को बुलाकर बिठा ले और उसे मालिक समझने लगे।
'खोस खोस कर खाय' — यह चित्रण बड़ा जीवंत है। जैसे कोई चिड़िया खेत में आकर दाना चुगती है — एक-एक करके, धीरे-धीरे, और पूरा खेत साफ कर देती है। वैसे ही ये बोरन हमारी आध्यात्मिक चेतना को, हमारे विवेक को, हमारे जीवन के समय को — एक-एक करके खा रहे हैं। और हमें पता भी नहीं चलता। सुबह उठे, फोन देखा, दिन बीत गया, रात हो गई — और हमने क्या किया? कुछ नहीं, बस 'खोस खोस' खा गए।
सहजो बाई ने इसी बात को अलग अंदाज़ में कहा — "माया महा ठगिनी हम जानी।" माया एक बड़ी ठगिनी है, और हम उसके ठगे हुए हैं। पर यहाँ ब्रह्मानंद जी ने 'बोरन' शब्द का प्रयोग किया है, जो माया से भी सूक्ष्म है — ये वे हैं जो हमें यह भी नहीं समझने देते कि हम ठगे जा रहे हैं।
झूठे कार-विहार
"झूठे कार विहार जगत के।
विरथा रही फसाय सखी॥"
'झूठे' — यह शब्द सुनकर कुछ लोगों को लग सकता है कि संत सब कुछ नकार रहे हैं। पर यहाँ 'झूठा' अर्थात् 'नश्वर', 'परिवर्तनशील', 'अस्थायी'। जो कल था वह आज नहीं, जो आज है वह कल नहीं। यह संसार का स्वभाव है। गुरु नानक देव जी ने कहा — "सबहु जगतु उपजै निसि नासै।" सारा जगत रात को उत्पन्न होकर नष्ट हो जाता है — यही इसकी सच्चाई है।
'कार विहार' — यहाँ केवल बुरे काम नहीं, बल्कि सारे काम। धन कमाना, घर बनाना, बच्चे पालना, नौकरी करना, पद-प्रतिष्ठा पाना — ये सब 'कार विहार' हैं। ये बुरे नहीं हैं, पर 'झूठे' हैं — अस्थायी हैं। आज है, कल नहीं। और जब हम इन्हें स्थायी समझकर फँस जाते हैं, तो वही 'विरथा' होती है।
'विरथा रही फसाय' — यहाँ 'विरथा' का अर्थ है निष्फल, व्यर्थ। हमने जीवन भर क्या किया? कमाया, खाया, पहना, सोया — और अंत में? हाथ में कुछ नहीं। जैसे कोई रेत पर महल बनाए और उसे अपना घर समझ बैठे। रैदास जी ने कहा — "ऐसी जाति निरंजन की" — पर वहाँ पहुँचने के लिए पहले यह समझना पड़ेगा कि हम कहाँ फँसे हैं।
'फसाय' — यह फँसावट अपने आप नहीं हुई। हमने खुद को फँसाया है। माया ने जाल बिछाया, पर हमने खुद उसमें कूदा। जैसे मछली चारे को देखकर हुक में फँसती है — वह जानती है कि यह खतरा है, फिर भी वह चारे को नहीं छोड़ सकती। हमारी हालत भी कुछ ऐसी ही है।
गुरु ज्ञान की अनिवार्यता
"बिन गुरु ज्ञान मोक्ष नहिं होवै।
कोटिन जतन कराय सखी॥"
यह भजन की सबसे महत्वपूर्ण पंक्तियों में से एक है। सामान्यतः लोग इसका अर्थ केवल इतना समझते हैं कि गुरु के बिना मोक्ष नहीं मिलता, लेकिन संत ब्रह्मानंद जी का जोर केवल "गुरु" पर नहीं, बल्कि "गुरु-ज्ञान" पर है।
संतमत में गुरु का महत्व इसलिए नहीं है कि वे किसी संप्रदाय के प्रमुख हैं या किसी परंपरा के प्रतिनिधि हैं। उनका महत्व इसलिए है कि वे उस ज्ञान के अधिकारी हैं जो जीव को उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराता है। यह ज्ञान पुस्तकों से प्राप्त होने वाला बौद्धिक ज्ञान नहीं है। यह आत्मा को स्वयं की पहचान कराने वाला अनुभवजन्य ज्ञान है।
यही कारण है कि संतों ने केवल श्रद्धा को पर्याप्त नहीं माना। श्रद्धा आवश्यक है, लेकिन श्रद्धा का उद्देश्य अनुभव तक पहुँचना है। यदि केवल विश्वास ही पर्याप्त होता, तो संसार में करोड़ों धार्मिक लोग पहले ही मुक्त हो चुके होते। संत ब्रह्मानंद जी कहते हैं कि "कोटिन जतन" करने पर भी मोक्ष नहीं होता, क्योंकि प्रयास बाहर हो रहे हैं जबकि बंधन भीतर हैं।
संतमत की दृष्टि से अज्ञान का अर्थ है — अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाना। और गुरु-ज्ञान का अर्थ है — उस विस्मृति का अंत। जब तक जीव स्वयं को केवल शरीर, मन, नाम, जाति और सांसारिक पहचान तक सीमित समझता है, तब तक वह बंधन में है। गुरु-ज्ञान उसे बताता है कि उसका वास्तविक स्वरूप इन सबसे परे है।
यही ज्ञान धीरे-धीरे सुरत को बाहर से हटाकर भीतर की ओर मोड़ता है। और यही वह बिंदु है जहाँ साधना केवल कर्मकांड नहीं रहती, बल्कि आत्म-अनुभूति की यात्रा बन जाती है।
गुरु पूरा और भवबंधन का मिटना
"ब्रह्मानंद मिले गुरु पूरा।
भवबंधन मिट जाय सखी॥"
अंत में संत ब्रह्मानंद जी अपना अनुभव प्रस्तुत करते हैं। 'ब्रह्मानंद' — यह दोहरा अर्थ रखता है। एक तो यह भजन के रचयिता का नाम है, और दूसरा यह वह अवस्था है जो ब्रह्म के साक्षात्कार से प्राप्त होती है। जब गुरु पूरा मिल जाता है, तो ब्रह्मानंद स्वयं प्रकट हो जाता है — यह कोई बाहर से लानी पड़ने वाली चीज़ नहीं।
'गुरु पूरा' — 'पूरा' शब्ड बड़ा गहरा है। पूरा अर्थात् जिसमें कुछ कमी नहीं। जो स्वयं पूर्ण है और जो दूसरों को भी पूर्णता तक पहुँचा सके। गुरु नानक देव जी ने कहा — "पूरा सतगुरु जाणिए, जिसु दीआ समझाए।" पूरा सतगुरु वही है जो सच्चाई की समझ दे सके।
'भवबंधन' — ये वे बंधन हैं जो जन्म-मरण के चक्र में डालते हैं। अहंकार, वासना, मोह, कर्म-संस्कार — ये सब बेड़ियाँ हैं। और ये बेड़ियाँ लोहे की नहीं हैं — ये तो मन की हैं, विचारों की हैं, संस्कारों की हैं। और जब गुरु का ज्ञान होता है, तो ये बंधन 'मिट जाय' — अपने आप मिट जाते हैं। जैसे अंधेरे में रोशनी आने पर अंधेरा अपने आप भाग जाता है — उसे भगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
सुरत की भीतरी यात्रा — भजन का छिपा हुआ आयाम
यदि पूरे भजन को ध्यान से देखा जाए, तो इसके केंद्र में सुरत की यात्रा छिपी हुई दिखाई देती है।
पहले चरण में जीवात्मा संसार में भटक रही है। उसका मन तप रहा है, बेचैन है, असंतुष्ट है। फिर उसे सतगुरु का सान्निध्य मिलता है। गुरु केवल सांत्वना नहीं देते, बल्कि उसकी सुरत को एक नई दिशा प्रदान करते हैं।
"मुझे सतगुरु संत मिलाय सखी" — यह वास्तव में सुरत और शब्द के मिलन की शुरुआत है।
इसके बाद जीव समझने लगता है कि वह जिन चीज़ों को अपना समझकर बैठा था, वे सब अस्थायी हैं। "बोरन की नगरिया" और "झूठे कार विहार" इसी बाहरी भटकाव का चित्रण हैं। धीरे-धीरे सुरत संसार के आकर्षणों से हटकर अपने स्रोत की ओर मुड़ने लगती है।
संतमत में इसे अंतर्मुखी यात्रा कहा गया है। यह यात्रा पैरों से नहीं, चेतना से होती है। बाहर की दूरी नहीं, भीतर की गहराई तय करनी होती है।
जब गुरु-ज्ञान हृदय में जागता है, तब सुरत माया के जाल से ऊपर उठने लगती है। वही सुरत जो पहले विषयों में भटकती थी, अब अपने मूल की खोज करने लगती है। और यही खोज अंततः भवबंधन से मुक्ति का कारण बनती है।
इस दृष्टि से देखें तो पूरा भजन वास्तव में सुरत के जागरण, उसके शुद्धीकरण और उसके परम सत्य की ओर लौटने की यात्रा का संक्षिप्त वर्णन है।
यह केवल उपदेश नहीं है। संत ब्रह्मानंद जी अपने जीवन की कमाई बता रहे हैं। जैसे कोई यात्री कठिन पर्वत पार करके लौटे और कहे — "हाँ, रास्ता है। मैं होकर आया हूँ।" वैसे ही ब्रह्मानंद जी कह रहे हैं कि पूर्ण गुरु के मिल जाने पर भवबंधन सचमुच मिट सकता है।
एक आंतरिक सवाल
इस भजन को पढ़ते हुए मन में एक बात आती है — हम सब कहीं न कहीं 'बोरन की नगरिया' में रह रहे हैं। हमारे मन में कई 'बोरन' बैठे हैं जो हमें धीरे-धीरे 'खोस-खोस कर' खा रहे हैं। और हमें पता भी नहीं चलता। हम सोचते हैं कि हम जी रहे हैं, पर वास्तव में हम खाए जा रहे हैं।
सवाल यह है — क्या हमने वास्तव में अपने 'सतगुरु संत' को पहचाना है? या हम अभी भी 'कोटिन जतन' में उलझे हुए हैं, यह सोचकर कि हमारे प्रयास ही काफी हैं? और अगर गुरु मिल भी गए हैं, तो क्या हमने उनसे वह 'ज्ञान' लिया है जो 'मन की तपत' बुझा सके, या हम अभी भी 'झूठे कार विहार' में फँसे हुए हैं?
यह सवाल कोई आरोप नहीं है। यह एक आंतरिक जाँच है, एक चिंतन है, एक मौन प्रश्न है जो हर साधक को अपने भीतर उठाना चाहिए। क्योंकि जब तक यह सवाल नहीं उठेगा, तब तक 'भवबंधन' मिटने की बात भी केवल शब्दों की बात रहेगी — और शब्दों से बंधन नहीं टूटते, अनुभव से टूटते हैं।
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ब्रह्मानंद भजन
