मैं इस भजन को पहली बार सुना था... बहुत साल पहले। एक सर्द सुबह थी, पिताजी अपनी पुरानी रेडियो पर बैठे हूं रहे थे। अचानक एक आवाज़ आई — दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी, अँखियाँ प्यासी रे। मैंने पूछा, "पिताजी, यह कौन गा रहा है?" वह मुस्कुराए और बोले, "बेटा, यह 1957 की फिल्म 'नरसी भगत' का गीत है। लेकिन सुनो तो लगता है कि सूरदास खुद बोल रहे हैं।"
उस दिन मुझे लगा था कि कोई अंधा कवि अपनी आंखों की प्यास बता रहा है। बड़ा होने पर पिताजी ने समझाया कि यह प्यास आंखों की नहीं, आत्मा की है। और वह आंखें जो देख नहीं सकतीं, वही सबसे ज्यादा देखती हैं। पिताजी कहते थे, "बेटा, सूरदास की आत्मा इतनी शक्तिशाली थी कि वह किसी भी कवि के शब्दों में घुस जाती है। यह गीत फिल्म का है, लेकिन सूरदास का दिल इसमें धड़क रहा है।"
भजन
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी, अँखियाँ प्यासी रे |
मन मंदिर की जोत जगा दो, घाट घाट वासी रे ||
मंदिर मंदिर मूरत तेरी, फिर भी न दीखे सूरत तेरी |
युग बीते ना आई मिलन की पूरनमासी रे ||
द्वार दया का जब तू खोले, पंचम सुर में गूंगा बोले |
अंधा देखे लंगड़ा चल कर पँहुचे काशी रे ||
पानी पी कर प्यास बुझाऊँ, नैनन को कैसे समजाऊँ |
आँख मिचौली छोड़ो अब तो मन के वासी रे ||
निबर्ल के बल धन निधर्न के, तुम रखवाले भक्त जनों के |
तेरे भजन में सब सुख़ पाऊं, मिटे उदासी रे ||
नाम जपे पर तुझे ना जाने, उनको भी तू अपना माने |
तेरी दया का अंत नहीं है, हे दुःख नाशी रे ||
आज फैसला तेरे द्वार पर, मेरी जीत है तेरी हार पर |
हर जीत है तेरी मैं तो, चरण उपासी रे ||
द्वार खडा कब से मतवाला, मांगे तुम से हार तुम्हारी |
नरसी की ये बिनती सुनलो, भक्त विलासी रे ||
लाज ना लुट जाए प्रभु तेरी, नाथ करो ना दया में देरी |
तिन लोक छोड़ कर आओ, गंगा निवासी रे ||
सूरदास कौन थे? — पिताजी की जुबानी
पिताजी कहते थे, सूरदास का जन्म 1478 में मथुरा के पास सीही गांव में हुआ। बचपन से ही उनकी आंखों की रोशनी कम थी, और धीरे-धीरे वे पूरी तरह अंधे हो गए। लेकिन यह अंधापन उनकी कविता को और गहरा बना गया। जो लोग आंखों से देखते हैं, वे अक्सर सतह पर रुक जाते हैं। सूरदास ने अपने मन की आंखों से देखा, और वही देखा जो सच था।
वे वल्लभाचार्य जी के शिष्य थे। पूरी जिंदगी वृंदावन में बिताई, कृष्ण के बाल लीलाओं पर गीत लिखे। उनकी "सूरसागर" आज भी भक्ति साहित्य का एक अमूल्य खजाना है। 1583 में उनका देहावसान हुआ, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी वृंदावन की गलियों में गूंजती है। पिताजी एक बार वृंदावन गए थे, एक बुजुर्ग भजन गायक ने यही भजन गाया। पिताजी ने कहा, "बेटा, आंखें बंद करके सुना तो लगा कि सूरदास खुद वहीं कहीं बैठे हैं।"
यह फिल्मी गीत सूरदास से इतना क्लोज़ क्यों लगता है?
यह सवाल मैंने कई बार पिताजी से पूछा। वह हमेशा एक ही बात कहते थे — "बेटा, जब कोई कवि सच्चे दिल से लिखता है, तो वह सूरदास की भाषा बोलने लगता है।"
1957 में फिल्म 'नरसी भगत' के लिए यह गीत लिखा गया। नरसी भगत गुजराती संत थे, उनकी कथा पर यह फिल्म बनी। लेकिन गीतकार ने जो शब्द चुने, वह सीधे सूरदास की परंपरा से निकले। पिताजी कहते थे, "देखो बेटा, सूरदास की शैली में कुछ खास बातें हैं — आंखों की प्यास, मन की जोत, प्रभु से शर्त लगाना, और अपनी कमजोरी को याद दिलाकर प्रभु को बुलाना। यह गीत में सब कुछ है।"
पिताजी एक बार और गहराई से समझाया थे। वह बोले, "सूरदास की कविता में एक व्याकुलता है, एक बेचैनी है। वह अंधे हैं, लेकिन देखने की लालसा रखते हैं। वह प्रभु से शिकायत करते हैं, लेकिन शिकायत में भी प्रेम है। यह गीत में वही व्याकुलता है — अँखियाँ प्यासी रे। यह सिर्फ शब्द नहीं, एक आत्मा की पुकार है।"
और एक बात और। पिताजी कहते थे कि सूरदास की भाषा ब्रज भाषा थी, और इस गीत में भी वही ब्रज का स्वाद है। "घनश्याम नाथ मोरी", "अँखियाँ प्यासी रे", "मन मंदिर की जोत" — यह सब ब्रज की धुन में बंधे हैं। जब कोई कवि इस धुन में लिखता है, तो सूरदास की आत्मा स्वतः प्रवेश कर जाती है। पिताजी मुस्कुराते हुए कहते थे, "यह कोई जादू नहीं है बेटा, यह भक्ति साहित्य की शक्ति है।"
इस भजन में गीतकार क्या बताना चाहते हैं?
यह भजन एक भक्त की पुकार है। लेकिन यह कोई साधारण पुकार नहीं है। यह उस व्यक्ति की पुकार है जो दुनिया से हार चुका है, जो हर दरवाजे पर दस्तक दे चुका है, और अब आखिरी दरवाजे पर खड़ा है — अपने प्रभु के दरवाजे पर। गीतकार कहते हैं कि मेरी आंखें प्यासी हैं, मेरा मन एक बुझी हुई जोत है, इसे जला दो। यह वह प्यास है जो पानी से नहीं बुझती। यह वह जोत है जो तेल-बाती से नहीं जलती।
पिताजी एक बार इस गीत को सुनते हुए रो पड़े थे। मैंने पूछा, "पिताजी, क्या हुआ?" वह बोले, "बेटा, यह गीत मुझे तुम्हारे दादा जी की याद दिलाता है। वह भी रोज़ सुबह यही कहते थे — दर्शन दो घनश्याम। और फिर वह चले गए, बिना दर्शन दिए।" मैंने कहा, "लेकिन पिताजी, वह तो चले गए।" वह मुस्कुराए और बोले, "नहीं बेटा, वह यहीं हैं। बस हमारी आंखें अंधी हैं, जैसे सूरदास की थीं।"
और सबसे खास बात — इस गीत में भक्त अपनी शर्त रखता है। वह कहता है, आज फैसला तेरे द्वार पर, मेरी जीत है तेरी हार पर। यह कोई डरी हुई प्रार्थना नहीं, यह प्रेमी की शर्त है। जैसे कोई प्यार करने वाला कहता है — "अब तो मिलना ही पड़ेगा, मेरे बिना तुम्हारी हार है।" पिताजी कहते थे, "यह शर्त सिर्फ सूरदास ही लगा सकते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि उनका प्रेमी कभी हार नहीं मानेगा।"
भजन का भावार्थ — पिताजी की व्याख्या
"दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी, अँखियाँ प्यासी रे"
गीतकार सीधे कहते हैं — हे घनश्याम (कृष्ण), मेरी आंखें तुम्हें देखने को तरस रही हैं। यहां "प्यास" शब्द बहुत मायने रखता है। पिताजी कहते थे, "बेटा, प्यास वह चीज है जो बिना पिए नहीं मानती। और इस भक्त की प्यास ऐसी है जो सिर्फ तुम्हारे दर्शन से बुझेगी।" मैंने एक बार पूछा, "पिताजी, क्या अंधा देख सकता है?" वह बोले, "बेटा, हम सब अंधे हैं। कुछ आंखों से, कुछ दिल से। सूरदास ने दिल की आंखों से देखा, और वही सबसे सच्ची दृष्टि है।"
"मन मंदिर की जोत जगा दो, घाट घाट वासी रे"
भक्त कहता है कि मेरा मन एक मंदिर है, लेकिन उसमें जोत बुझी हुई है। इसे जला दो। और फिर याद दिलाता है — तुम तो घाट-घाट में रहने वाले हो, हर जगह हो। फिर क्यों मुझसे दूर हो? पिताजी कहते थे, "जब कोई हर जगह हो, तो उसके सामने छिपना मुश्किल होता है। यह भक्त यही कह रहा है — तुम मुझसे छिप नहीं सकते।"
"मंदिर मंदिर मूरत तेरी, फिर भी न दीखे सूरत तेरी"
यह पंक्ति पढ़ते ही दिल में एक अजीब सा दर्द होता है। भक्त कहता है कि मैं हर मंदिर गया, हर मूरत देखी, लेकिन तेरी असली सूरत कहीं नहीं दिखी। पिताजी एक बार कह रहे थे, "बेटा, हम मंदिर जाते हैं, मूरत देखते हैं, लेकिन जो हम ढूंढ रहे हैं, वह कहीं और होता है। मूरत में नहीं, भाव में होता है। सूरदास यही कहते थे — मूरत देख ली, पर सूरत नहीं दिखी।"
"युग बीते ना आई मिलन की पूरनमासी रे"
यह बहुत दुख भरी पंक्ति है। भक्त कहता है कि युग बीत गए, लेकिन मिलन की पूरनमासी (पूर्णिमा) नहीं आई। पिताजी कहते थे, "पूरनमासी वह रात है जब चांद पूरा होता है। और मिलन की पूरनमासी वह क्षण है जब भक्त और प्रभु एक हो जाते हैं।" मैंने पूछा, "पिताजी, क्या यह कभी आती है?" वह बोले, "आती है बेटा, लेकिन इंतज़ार में। और इंतज़ार में भी सुंदरता है।"
"द्वार दया का जब तू खोले, पंचम सुर में गूंगा बोले"
अब भक्त एक बड़ी बात कहता है। जब तू अपने दया के द्वार खोलता है, तो गूंगा भी पंचम सुर में बोलने लगता है। पिताजी कहते थे, "पंचम सुर संगीत का सबसे मधुर सुर माना जाता है। यहां का मतलब है कि तेरी कृपा से असंभव संभव हो जाता है।" मैंने यह अपनी जिंदगी में देखा है। जब पिताजी बीमार थे, और फिर अचानक कोई रास्ता खुल गया। वही पंचम सुर है, वही कृपा है।
"अंधा देखे लंगड़ा चल कर पँहुचे काशी रे"
यह पंक्ति मुझे हमेशा रुलाती है। भक्त कहता है कि तेरी कृपा से अंधा देखने लगता है, लंगड़ा चलकर काशी पहुंच जाता है। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह कोई चमत्कार नहीं। यह भाव का चमत्कार है। जब तुम पूरी तरह टूट जाते हो, और फिर अचानक कोई ताकत आ जाती है — वही यह है।" और खुद भक्त तो अंधा है, क्या वह खुद के लिए यह मांग रहा है? पिताजी कहते थे, "शायद हां, शायद नहीं। लेकिन एक भक्त अपने लिए मांगता है, और दूसरों के लिए भी गवाही देता है। यही भक्ति है।"
"पानी पी कर प्यास बुझाऊँ, नैनन को कैसे समजाऊँ"
भक्त कहता है कि शरीर की प्यास तो पानी से बुझती है, लेकिन आंखों की प्यास कैसे बुझाऊं? पिताजी कहते थे, "नैनन का मतलब आत्मा की आंखें हैं। वह प्यास जो दुनिया की कोई चीज नहीं बुझा सकती।" मैंने एक बार पूछा, "पिताजी, आप रोज़ भजन क्यों सुनते हैं?" वह बोले, "बेटा, कुछ प्यास ऐसी होती है जो सिर्फ इसी से बुझती है।" आज समझ आता है कि वह क्या कह रहे थे।
"आँख मिचौली छोड़ो अब तो मन के वासी रे"
अब भक्त थोड़ा नाराज़ होते हुए कहता है — अब बस करो, आंख मिचौली छोड़ो। तुम तो मेरे मन में रहने वाले हो, फिर क्यों छिप रहे हो? पिताजी मुस्कुराते हुए कहते थे, "यह प्रेमी की शिकायत है। जैसे कोई पत्नी कहे — 'तुम तो मेरे दिल में हो, फिर बाहर क्यों नहीं दिखते?' कितनी प्यारी शिकायत है न?"
"निबर्ल के बल धन निधर्न के, तुम रखवाले भक्त जनों के"
भक्त कहता है कि तुम निर्बलों का बल हो, गरीबों का धन हो, और भक्तों के रखवाले हो। पिताजी कहते थे, "यहां भक्त अपनी कमजोरी को याद दिलाता है। वह जानता है कि वह कमजोर है, लेकिन उसका प्रभु सबका रखवाला है।" यह भक्ति की सबसे बड़ी ताकत है — अपनी कमजोरी को स्वीकार करना और प्रभु पर भरोसा करना।
"तेरे भजन में सब सुख़ पाऊं, मिटे उदासी रे"
भक्त कहता है कि तेरे भजन में ही सब सुख है, इससे मेरी उदासी मिट जाती है। पिताजी कहते थे, "यह एक सच्चा अनुभव है। जब हम गाते हैं, भजन करते हैं, तो कुछ पल के लिए सब दुख भूल जाते हैं। यह कोई जादू नहीं, यह भाव का जादू है।"
"नाम जपे पर तुझे ना जाने, उनको भी तू अपना माने"
यह पंक्ति बहुत दिल को छूती है। भक्त कहता है कि जो लोग तेरा नाम तो जपते हैं, लेकिन तुझे नहीं जानते, उन्हें भी तू अपना मानता है। पिताजी कहते थे, "यह प्रभु की दया का वर्णन है। वह कठोर नहीं, वह दयालु है। कभी-कभी हम सोचते हैं कि हम प्रभु को नहीं जानते, तो वह हमें कैसे स्वीकार करेगा? यह गीत कहता है — बस नाम ले लो, बाकी वह देख लेगा।"
"तेरी दया का अंत नहीं है, हे दुःख नाशी रे"
भक्त कहता है कि तेरी दया का कोई अंत नहीं है, हे दुखों को नाश करने वाले। पिताजी कहते थे, "जब सब कुछ खत्म हो जाए, तब भी दया बची रहती है। बस दस्तक देनी है।" मैंने एक बार एक बहुत गरीब बुजुर्ग को सुना था, वह कह रहे थे, "बाबू, मेरे पास कुछ नहीं है, लेकिन प्रभु की दया है।" पिताजी मुस्कुराए और बोले, "देखा बेटा, यही सूरदास की भाषा है।"
"आज फैसला तेरे द्वार पर, मेरी जीत है तेरी हार पर"
अब भक्त अपनी शर्त रखता है। वह कहता है कि आज तेरे दरवाजे पर फैसला होगा। अगर तू मुझे मिला, तो मेरी जीत है। और अगर नहीं मिला, तो तेरी हार है। पिताजी इस पंक्ति पर बहुत जोर देते थे। वह कहते, "बेटा, यह कोई अहंकार नहीं। यह प्रेम का विश्वास है। जब आप किसी से सच्चा प्रेम करते हैं, तो आप जानते हैं कि वह आपको नहीं टाल सकता। यह शर्त प्रेम की शर्त है।" मैंने पूछा, "पिताजी, क्या प्रभु हार मान लेते हैं?" वह हंसे और बोले, "बेटा, प्रभु तो हारने के लिए ही आते हैं। यही तो उनकी लीला है।"
"हर जीत है तेरी मैं तो, चरण उपासी रे"
भक्त कहता है कि हर जीत तेरी है, मैं तो सिर्फ तेरे चरणों की उपासना करता हूं। पिताजी कहते थे, "यहां वह अपनी शर्त को नम्रता में बदल देता है। जीत तेरी, मैं तो सिर्फ तेरा सेवक हूं। यह भक्ति का सबसे ऊंचा स्तर है — शर्त लगाना और फिर खुद को समर्पित कर देना।"
"द्वार खडा कब से मतवाला, मांगे तुम से हार तुम्हारी"
भक्त कहता है कि मैं तेरे दरवाजे पर कब से खड़ा हूं, मतवाला होकर। और मैं तुमसे तुम्हारी हार मांग रहा हूं। पिताजी कहते थे, "मतवाला वह होता है जो दुनिया की परवाह नहीं करता। यह भक्त प्रभु के प्रेम में मतवाला हो गया है। और एक मतवाला क्या मांगता है? वह मांगता है कि तुम हार जाओ, मुझसे मिल जाओ।"
"नरसी की ये बिनती सुनलो, भक्त विलासी रे"
अंत में भक्त अपना नाम लेता है — नरसी की यह बिनती सुनो। और प्रभु को "भक्त विलासी" कहता है — जो भक्तों से प्रेम करने वाला है। पिताजी कहते थे, "यह एक भक्त की आखिरी अपील है। सुन लो, मेरी बात सुन लो। कितनी सुंदर बात है न? एक भक्त, जो कुछ नहीं मांगता, बस यह मांगता है कि सुन लो।"
"लाज ना लुट जाए प्रभु तेरी, नाथ करो ना दया में देरी"
भक्त कहता है कि प्रभु, तेरी लाज ना लुट जाए। अगर तू मुझे नहीं मिला, तो लोग कहेंगे कि तेरी दया झूठी है। इसलिए दया में देरी मत करो। पिताजी इस पर हंसते थे और कहते, "देखो बेटा, यह भक्त की चालाकी है। वह अपने प्रभु की इज्जत का सहारा लेता है। और फिर कहता है — तिन लोक छोड़ कर आओ, गंगा निवासी रे। तुम तीनों लोकों में रहने वाले हो, गंगा के किनारे रहने वाले हो, फिर मेरे लिए क्यों नहीं आ रहे हो? यह आखिरी पुकार है, आखिरी अपील।"
इस भजन से हमें क्या सीख मिलती है?
पिताजी हमेशा कहते थे, "बेटा, हर भजन में एक संदेश नहीं, एक अनुभव होता है।" इस भजन का अनुभव क्या है?
सबसे पहली बात — असली दर्शन आंखों से नहीं होता। पिताजी कहते थे, "सूरदास अंधे थे, लेकिन उन्होंने वह देखा जो देखने वाले नहीं देख पाते। हम सब आंखों से देखते हैं, लेकिन कितने कम लोगों को असली दर्शन होता है। दर्शन वह है जब दिल खुल जाए, जब आत्मा झूम उठे।"
दूसरी बात — प्रेम में शर्त लगाना भी अनुमति है। पिताजी कहते थे, "यह शर्त नहीं, यह प्रेम का विश्वास है। जब आप किसी से सच्चा प्रेम करते हैं, तो आप जानते हैं कि वह आपको नहीं टाल सकता। यह शर्त प्रेम की शर्त है।" मैंने एक बार पूछा, "पिताजी, क्या आपने कभी ऐसी शर्त लगाई?" वह मुस्कुराए और बोले, "रोज़ लगाता हूं बेटा, रोज़ लगाता हूं।"
तीसरी बात — दया का कोई अंत नहीं। पिताजी कहते थे, "जब सब कुछ खत्म हो जाए, तब भी एक दरवाजा खुला है। बस दस्तक देनी है।" मैंने पूछा, "पिताजी, क्या वह दरवाजा हमेशा खुला रहता है?" वह बोले, "हां बेटा, बस हमारी आंखें बंद होती हैं।"
चौथी बात — इंतज़ार में भी सुंदरता है। पिताजी कहते थे, "युग बीत गए, लेकिन पूरनमासी नहीं आई। फिर भी इंतज़ार कर रहे हैं। यह इंतज़ार निराशा नहीं, आशा है। क्योंकि जो इंतज़ार करता है, वह जानता है कि एक दिन जरूर आएगा।"
यह भजन कब गाया जाता है?
मैंने इसे कई मौकों पर सुना। सुबह के भजन में, जब घर में पूजा होती है। शाम को, जब सूरज डूब रहा हो और मन थोड़ा उदास हो। मंदिरों में, विशेषकर कृष्ण मंदिरों में, यह बहुत सुना जाता है। जन्माष्टमी के आसपास, जब वृंदावन में रौनक होती है, तो यह भजन हर गली से आता है।
पिताजी कहते थे, "इस भजन को गाने का सबसे अच्छा समय वह है जब मन बहुत व्याकुल हो। जब लगे कि कुछ खो गया है, जब दुनिया बहुत बड़ी लगे, जब अकेलेपन का एहसास हो।" मैंने पूछा, "पिताजी, आप कब गाते हैं?" वह बोले, "जब तुम्हारी मां बीमार थीं, तब रोज़ गाता था। और फिर वह ठीक हो गईं। शायद प्रभु ने मेरी हार मान ली।"
मेरे पिताजी के एक मित्र थे, बहुत बीमार रहते थे। रोज़ सुबह यह भजन सुनते थे। एक दिन पिताजी ने पूछा, "भाई साहब, रोज़ यही क्यों?" वह बोले, "भाई साहब, जब लगे कि अब कुछ नहीं बचा, तब यह याद दिलाता है कि एक दरवाजा अभी भी खुला है।" कुछ महीने बाद उनका देहांत हो गया। पिताजी ने कहा, "बेटा, मुझे यकीन है कि उनकी आखिरी सांस तक वह दरवाजा खुला था। और शायद, उन्होंने उसी दरवाजे से प्रवेश किया।"
FAQs अक्सर पूछे जाने वाले सवाल — पिताजी के जवाब
1. यह भजन फिल्म 'नरसी भगत' का है, लेकिन सूरदास से क्यों मिलता है?
पिताजी कहते थे, "बेटा, जब कोई कवि सच्चे दिल से लिखता है, तो वह सूरदास की भाषा बोलने लगता है। इस गीत में सूरदास की सारी पहचान है — आंखों की प्यास, मन की जोत, प्रभु से शर्त लगाना, और अपनी कमजोरी को याद दिलाकर प्रभु को बुलाना। यह सब सूरदास की परंपरा से आया है। और फिर, इसकी भाषा ब्रज है, जो सूरदास की भाषा थी। जब ब्रज में कोई भजन लिखता है, तो सूरदास की आत्मा स्वतः प्रवेश कर जाती है।"
2. "घनश्याम" का मतलब क्या है?
पिताजी कहते थे, "घनश्याम का अर्थ है घने काले बादल जैसे श्याम (कृष्ण)। कृष्ण का रंग घना श्याम (काला) था, इसलिए उन्हें घनश्याम कहा जाता है। लेकिन एक और बात है — घन का मतलब घना भी होता है, और श्याम का मतलब शाम भी। जैसे घने बादल बरसात लाते हैं, वैसे ही घनश्याम भक्त के दिल में प्रेम की बरसात लाते हैं। सूरदास ने यह नाम इसलिए चुना क्योंकि यह नाम में ही बरसात है, और भक्त की आंखें बरसने को तैयार हैं।"
3. यह भजन किस राग में गाया जाता है?
पिताजी कहते थे, "यह अक्सर भैरवी, भूपाली या काफी राग में गाया जाता है। लेकिन मैंने इसे मल्हार में भी सुना है, जब बारिश हो रही हो और कोई पुराना भजन गायक गा रहा हो। राग का नाम जानना जरूरी नहीं। जो भी राग में आपका मन रोए, आपका मन गाए, वही सही है। मेरी मां कहती थीं — 'राग तो बहाने हैं, भाव तो दिल से आता है।'"
4. "मेरी जीत है तेरी हार पर" — क्या भक्त प्रभु से शर्त लगा सकता है?
पिताजी कहते थे, "बेटा, यह शर्त नहीं, यह प्रेम का विश्वास है। जब आप किसी से सच्चा प्रेम करते हैं, तो आप जानते हैं कि वह आपको नहीं टाल सकता। सूरदास कह रहे हैं कि अगर तू मुझे नहीं मिला, तो तेरी दया की हार होगी। और तू दयालु है, इसलिए तू हारेगा। यह कोई अहंकार नहीं, यह प्रेम की गहरी समझ है। जैसे बच्चा मां से शर्त लगाता है कि तुम मुझे रोने नहीं दोगी। वह जानता है कि मां हार जाएगी।"
5. "पंचम सुर में गूंगा बोले" — क्या यह सच हो सकता है?
पिताजी कहते थे, "बेटा, यहां मेटाफर (रूपक) का इस्तेमाल हुआ है। मतलब यह नहीं कि गूंगा सच में बोलने लगेगा। मतलब है कि तेरी कृपा से असंभव संभव हो जाता है। जो कभी नहीं बोल सकता, वह भी मधुर सुर में बोलने लगता है। मैंने यह अपनी जिंदगी में देखा है। जब इंसान पूरी तरह टूट जाता है, और फिर अचानक कोई रास्ता खुल जाता है। वही पंचम सुर है, वही कृपा है।"
6. सूरदास अंधे थे, फिर "अँखियाँ प्यासी" कैसे?
पिताजी कहते थे, "बेटा, सूरदास अपनी शारीरिक आंखों की बात नहीं कर रहे। वह अपनी आत्मा की आंखों की बात कर रहे हैं। जो लोग आंखों से देखते हैं, वे अक्सर सतह पर रुक जाते हैं। सूरदास ने अपने मन की आंखों से देखा, और वही देखा जो सच था। उनकी 'अँखियाँ' वह आंखें हैं जो हर भक्त के पास होती हैं, बस कुछ लोग उन्हें खोलते हैं, कुछ नहीं।"
7. इस भजन को सुनने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
पिताजी कहते थे, "रात को, जब सब सो गए हों, एक चिराग जल रहा हो, और आंखें बंद करके सुनो। शब्दों को महसूस करो। सूरदास की आवाज़ सुनने की कोशिश करो — वह आवाज़ जो सदियों से गूंज रही है। या फिर सुबह-सुबह, जब मन साफ हो, तब खुद गुनगुनाओ। पहले-पहले अजीब लगेगा, लेकिन धीरे-धीरे पता चलेगा कि यह कोई साधारण गीत नहीं, एक दोस्त है जो हमेशा साथ रहता है।"
अंत में...
मैंने कई बार सोचा कि सूरदास कैसे होंगे। कोई अंधा कवि, जो वृंदावन की गलियों में घूमता होगा, कृष्ण के बाल लीलाओं को गाता होगा। लोग उसे देखते होंगे, कुछ दया करते होंगे, कुछ उपेक्षा। लेकिन वह जानता था कि उसके पास क्या है। उसके पास वह आवाज़ थी जो आंखों से निकलकर दिल में उतरती थी।
पिताजी कहते थे, "बेटा, यह गीत फिल्म का है, लेकिन सूरदास का दिल इसमें धड़क रहा है। जब कोई कवि सच्चे दिल से लिखता है, तो वह सदियों पुरानी आवाज़ को पकड़ लेता है।" आज जब मैं यह गीत सुनता हूं, तो पिताजी की आवाज़ सुनाई देती है। और पिताजी की आवाज़ में, सूरदास की आवाज़। यह एक सिलसिला है, जो टूटता नहीं।
आज जब हम सब कुछ देखते हैं, फिर भी अंधे हैं, तब सूरदास की यह बात याद रखना बहुत जरूरी है। कि असली दर्शन आंखों से नहीं होता। असली दर्शन तब होता है जब दिल खुल जाए, जब आत्मा झूम उठे।
और सबसे बड़ी बात — सूरदास ने हमें सिखाया कि प्रेम में शर्म नहीं, शर्त लगाओ। मेरी जीत है तेरी हार पर। क्योंकि जो प्रेम करता है, वह जानता है कि उसकी हार में भी जीत है, और प्रभु की हार में भी जीत है।
पिताजी कहते थे, "बेटा, जब तुम्हें लगे कि सब कुछ खत्म हो गया, तब यह गीत गुनगुनाओ। दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी। और फिर देखना, एक दरवाजा खुलेगा। शायद वही दरवाजा जो हमेशा खुला था, बस हमारी आंखें बंद थीं।"
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी, अँखियाँ प्यासी रे...
