श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन: तुलसीदास का अमर राम भजन, भावार्थ और जीवन की सीख

             सुबह की हवा थी, ठंडी, साफ़। पिताजी बरामदे में बैठे थे, चारपाई पर, गोद में रामचरितमानस। मैं पास में खड़ा था, नहाने जा रहा था। अचानक उनकी आवाज़ उठी — संस्कृत की वो धुन जो मुझे कभी समझ नहीं आती थी, लेकिन कुछ अंदर हिला देती थी।

श्री रामचंद्र कृपालु भजमन भजन

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन...

मैं रुक गया। पिताजी ने आंखें नहीं खोलीं। बस गाते रहे। मुझे लगा जैसे कोई बहुत पुरानी चीज़ मेरे सामने खड़ी हो गई हो। जिसे मैं नाम नहीं दे सकता, लेकिन जो मुझे जानती है।

बाद में पता चला कि यह तुलसीदास जी का भजन है। पिताजी ने कहा था, "बेटा, यह भजन अगर रोज़ सुन लो, तो दिन अच्छा निकलता है। मैंने पूरी ज़िंदगी ऐसा ही किया।" आज, जब वह नहीं रहे, तो मैं समझता हूं कि उनका दिन कैसे निकलता था।


भजन


श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन, हरण-भव-भय दारुणं ।

नवकञ्ज-लोचन, कञ्जमुख, कज-कज्ञ, पद-कञ्जारुणं ॥१॥

कन्दर्प अगणित अमित छवि, नव नील नीरद सुन्दरं ।

पट-पीत मानहुँ तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं ॥२॥

भजु दीनबन्धु दिनेश दानव-दैत्य-वंश निकन्दनं ।

रघुनन्द आनँद-कंद कोसल चंद दसरथ-नन्दनं ॥३॥

सिर मुकुट कुडल तिलक चारु, उदार-अंग बिभूषणं ।

आजानु-भुज शर-चाप-धर संग्राम-जित खरदूषणं ॥४॥

इति बदति तुलसीदास, शंकर-शेष-मुनि-मन-रञ्जनं ।

मम ह्रदय-कज्ञ निवास कुरु, कामादि-खल-दल गञ्जनं ॥५॥

तुलसीदास — एक अनाथ बच्चा जिसने राम को अपनी ज़ुबान में बोलना सिखाया

जब मैंने पहली बार जाना कि यह भजन तुलसीदास ने लिखा है, तो मुझे हैरानी हुई। वही तुलसीदास जिन्होंने रामचरितमानस लिखी। सोचिए, जिसने इतना विशाल ग्रंथ लिखा, वही कुछ पंक्तियों में राम का पूरा स्वरूप भी खींच देता है।

पिताजी कहते थे, तुलसीदास का जन्म 1532 में हुआ, राजापुर या सोरों में। बचपन में ही मां-बाप छूट गए। लोग कहते हैं कि वह बोल नहीं सकते थे, जब तक एक संत ने उन्हें राम नाम नहीं दिया। फिर जो बोले, वो सोना बोले। वाराणसी में रहे, रामचरितमानस लिखी, हनुमान चालीसा लिखी। 1623 में चले गए।

पिताजी की एक बात मुझे हमेशा याद रहती है। वो कहते थे, "बेटा, रामचरितमानस तो बड़ा ग्रंथ है, लेकिन यह भजन छोटा है। और छोटी चीज़ें ज़्यादा गहराई में उतरती हैं। जैसे छोटी दवा ज़्यादा काम करती है।" मैंने हंसते हुए पूछा, "पिताजी, यह कौन सी दवा है?" वो बोले, "वो दवा जो मन को ठंडक देती है।"


इस भजन में तुलसीदास क्या कह रहे हैं?


"श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन, हरण-भव-भय दारुणं"

पहली पंक्ति में वो अपने मन से बात कर रहे हैं। हे मन, कृपालु रामचंद्र का भजन कर। जो इस भवसागर के डर को हर लेते हैं। पिताजी कहते थे, "देखो बेटा, 'भजु' का मतलब सिर्फ गाना नहीं। भजन का मतलब है अपना बनाना, अपने में समा लेना।"

मुझे बचपन में राम सिर्फ शांत और करुणामय लगते थे। बाद में समझ आया कि तुलसीदास उन्हें अन्याय के सामने खड़े होने वाली शक्ति के रूप में भी देखते हैं। हरण-भव-भय — जो भय को हर लेते हैं। यह कोई कमजोर भगवान नहीं, यह वो हैं जो राक्षसों से लड़े।


"नवकञ्ज-लोचन, कञ्जमुख, कज-कज्ञ, पद-कञ्जारुणं"

अब वो राम जी का वर्णन करते हैं। नवकंज-लोचन — कमल जैसी नई आंखें। कंजमुख — कमल जैसा मुख। कज-कंज — कमल जैसे हाथ। पद-कंजारुणम् — कमल जैसे चरण।

चारों तरफ कमल। पिताजी कहते थे, "कमल कीड़े-मकौड़ों वाली कीचड़ में भी साफ़ रहता है। राम जी भी इसी दुनिया में हैं, लेकिन साफ़ हैं।" मैंने एक बार पूछा, "पिताजी, क्या हम भी कीचड़ में रहकर साफ़ रह सकते हैं?" वो मुस्कुराए और बोले, "यही तो तुलसीदास पूछ रहे हैं।"


"कन्दर्प अगणित अमित छवि, नव नील नीरद सुन्दरं"

कामदेव भी जिनकी छवि के आगे फीके पड़ जाते हैं। नए बादल जैसे श्याम वर्ण। पिताजी कहते थे, "तुलसीदास रूप नहीं गा रहे, वो अनुभव बता रहे हैं। जब राम को देखा, तो क्या दिखा — यही।"

मैंने एक बार हमारे पुराने नेशनल पैनासोनिक टेप रिकॉर्डर पर पंडित जसराज जी की रिकॉर्डिंग सुनी थी। बीच-बीच में कैसेट अटक जाती थी। पिताजी पेंसिल डालकर घुमाते थे, फिर वही आवाज़ फिर से भर जाती थी। उस आवाज़ में यह पंक्ति आई — नव नील नीरद सुन्दरं। मुझे लगा कि कोई बादल मेरे सामने खड़ा हो गया है, जो बोल रहा है।


"पट-पीत मानहुँ तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं"

पीले वस्त्र, बिजली जैसी चमक। जनक की बेटी के पति। पिताजी कहते थे, "देखो बेटा, तुलसीदास एक पंक्ति में रूप भी बता रहे हैं, और रिश्ता भी। राम सिर्फ सुंदर नहीं, वो सीता के भी हैं।"


"भजु दीनबन्धु दिनेश दानव-दैत्य-वंश निकन्दनं"

दीनबन्धु — गरीबों के मित्र। दिनेश — सूर्य के समान। दानव-दैत्य-वंश निकन्दनम् — राक्षसों के वंश का नाश करने वाले। रघुनन्द आनन्द-कंद — रघुवंश की आनंद की जड़। कोसल चंद दसरथ-नन्दनम् — कोसल के चंद्रमा, दशरथ के नंदन।

एक ही पंक्ति में इतने नाम। हर नाम में एक नया रंग। पिताजी कहते थे, "यही तुलसीदास की कला है।"


"सिर मुकुट कुडल तिलक चारु, उदार-अंग बिभूषणं"

मुकुट, कुण्डल, तिलक। उदार अंग विभूषणम् — शरीर पर उदार आभूषण। आजानु-भुज — घुटनों तक पहुंचने वाली भुजाएं। शर-चाप-धर — धनुष-बाण धारण करने वाले। संग्राम-जित खरदूषणम् — युद्ध में खर-दूषण को जीतने वाले।

यहां राम की वीरता का वर्णन है। पिताजी कहते थे, "राम सिर्फ प्रेमी नहीं, योद्धा भी हैं। जब धर्म पर आंच आती है, तब धनुष उठाते हैं।" मैंने एक बार पूछा, "पिताजी, क्या हमें भी धनुष उठाना चाहिए?" वो बोले, "बेटा, हर किसी का धनुष अलग होता है। किसी का कलम है, किसी का वचन है, किसी का कर्म है।"


"इति बदति तुलसीदास, शंकर-शेष-मुनि-मन-रञ्जनं"

इस प्रकार तुलसीदास कहते हैं। जो शिव, शेषनाग, मुनियों के मन को रंजित करते हैं। और फिर वो कहते हैं — मम ह्रदय-कंज निवास कुरु — मेरे हृदय-कमल में निवास करो। कामादि-खल-दल गंजनं — जो काम, क्रोध आदि दुष्टों के समूह का नाश करते हैं।

पिताजी कहते थे, "यहां तुलसीदास सब कुछ कह चुके हैं, और अब एक ही बात मांग रहे हैं — मेरे दिल में आ जाओ। बस। इतनी बड़ी कविता, और अंत में यही।"


इस भजन से क्या सीख मिलती है?

पहली सीख — मन को संबोधित करना ज़रूरी है। तुलसीदास अपने मन से बात कर रहे हैं। हमारा मन भटकता है, उसे रोकना पड़ता है। पिताजी कहते थे, "बेटा, मन को कहो — रुक, सुन, अभी यहीं रह।"

दूसरी सीख — वर्णन से प्रेम बढ़ता है। जितना ज़्यादा राम को देखोगे, उतना ज़्यादा प्रेम होगा। तुलसीदास ने आंखें देखीं, मुख देखा, हाथ देखे, चरण देखे। हर अंग में राम को पाया। जब तुम किसी से प्रेम करते हो, तो उसका हर अंग याद रहता है न? वही यहां है।

तीसरी सीख — वीरता और प्रेम साथ-साथ चलते हैं। राम धनुष भी उठाते हैं, और प्रेम भी करते हैं। जो सिर्फ प्रेम करता है लेकिन अन्याय देखकर चुप रहता है, वो प्रेमी नहीं कायर है। राम ने दिखाया कि प्रेम में वीरता होनी चाहिए।

चौथी सीख — अंत में सब कुछ एक ही बात पर आता है। इतना सब कुछ कहने के बाद, तुलसीदास कहते हैं — मेरे दिल में आ जाओ। ज्ञान, भक्ति, कर्म — सब एक ही जगह मिलते हैं। दिल में।


यह भजन किस राग में गाया जाता है?

यह भजन अक्सर यमन या भूपाली राग में गाया जाता है। सबसे ज़्यादा जो इसे गाया, वो पंडित जसराज जी हैं। उनकी आवाज़ में यह भजन एक अलग ही जान पा गया।

इसके अलावा एम.एस. सुब्बलक्ष्मी जी, भीमसेन जोशी जी, लता मंगेशकर जी — कई कलाकारों ने इसे अपना रंग दिया। हर किसी की आवाज़ में एक अलग तुलसीदास सुनाई देता है। जब तुलसीदास बोलते हैं, तो हर आवाज़ में राम खुद आ जाते हैं।


यह भजन इतना प्रसिद्ध क्यों है?

संस्कृत में लिखा हुआ, फिर भी सीधा। तुलसीदास ने संस्कृत को आम आदमी की ज़ुबान बना दी। जो शब्द मंदिर में सुनते थे, वही अब घर में गाए जाने लगे।

हर छंद में एक नया रंग। पहले रूप, फिर गुण, फिर वीरता, फिर प्रार्थना। जैसे कोई चित्र बन रहा हो, और हर रंग में एक नई गहराई। यह भजन पढ़ते जाओ, हर बार कुछ नया मिलता है।

और वो अंतिम पंक्ति — मम ह्रदय-कंज निवास कुरु। यह हर किसी की पुकार है। चाहे विद्वान हो, चाहे अनपढ़। सबका दिल एक जैसा ही होता है, और सब एक ही बात मांगते हैं।


FAQs कुछ बातें जो लोग अक्सर पूछते हैं


"संस्कृत नहीं आती, फिर भी कैसे समझें?"

"शब्दों की ज़रूरत नहीं, धुन की ज़रूरत है। एक बार सुनो, दो बार सुनो, तीसरी बार शब्द अपने आप खुलने लगेंगे। और जो न खुले, वो भाव से समझ आएगा। तुलसीदास ने यह भजन भाव के लिए ही लिखा है।" मैंने खुद अनुभव किया है। आज भी संस्कृत के कई शब्द मुझे नहीं आते, लेकिन जब श्रीरामचन्द्र कृपालु सुनता हूं, तो कुछ अंदर खुल जाता है। शायद वही भाव है।


"हर अंग में कमल क्यों आता है?"

तुलसीदास बार-बार कमल का रूपक चुनते हैं। शायद इसलिए कि कमल कीचड़ में खिलता है, लेकिन कीचड़ उसका हिस्सा नहीं बनती। राम इसी दुनिया में हैं, लेकिन इसकी गंदगी से अलग। बस। ज़्यादा समझाने की ज़रूरत नहीं।


"इसे गाने का सबसे अच्छा समय क्या है?"

सुबह, जब मन साफ़ हो। या शाम, जब दिन का थकावट उतर रहा हो। पिताजी रोज़ सुबह गाते थे। एक बार गा लो, फिर देखो दिन कैसा निकलता है।


अंत में...

पिताजी की एक आदत थी। हर सुबह, नहाने से पहले, वो इस भजन का एक छंद गाते थे। मैंने कभी पूछा नहीं क्यों। शायद उन्हें लगता था कि दिन की शुरुआत इससे बेहतर नहीं हो सकती।

आज, जब मैं अपने बरामदे में बैठता हूं, सुबह की ठंडी हवा में, तो कभी-कभी मेरी आवाज़ निकल जाती है। श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन... और फिर लगता है कि पिताजी कहीं पास ही हैं, अपनी चारपाई पर, आंखें बंद किए, मुस्कुरा रहे हैं।

सच कहूं तो बचपन में मुझे संस्कृत का एक शब्द भी समझ नहीं आता था। आज भी इस भजन की पहली पंक्ति सुनता हूं, तो बरामदे की वही सुबह याद आ जाती है। मोमबत्ती नहीं, बल्ब नहीं, सिर्फ सुबह की धूप और पिताजी की आवाज़।

पिताजी कहते थे, "बेटा, तुलसीदास ने राम को अपनी ज़ुबान दी। लेकिन हर किसी को अपनी ज़ुबान मिलती है। बस गाने की ज़रूरत है।"

आज भी कभी-कभी वही धुन सुनता हूं तो लगता है कि बरामदे में एक चारपाई अभी भी पड़ी है, रामचरितमानस का वही पुराना संस्करण खुला है, और पिताजी अगला छंद शुरू करने वाले हैं।


श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन...

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने