हमारे घर में एक पुराना रेडियो था। मर्फी का, लकड़ी का ढक्कन, जो खोलने पर हल्की सी गंध आती थी — कपूर और पुराने तेल की। एंटीना घुमाना पड़ता था, और बरसात के दिनों में स्टेशन गायब हो जाता था। पिताजी रोज़ सुबह उसे चालू करते। एक बार अचानक एक आवाज़ निकली जो रुकती ही नहीं थी।
आज दिवस लेऊँ बलिहारा, मेरे घर आया रामका प्यारा...
मैंने कहा, "पिताजी, यह कुछ अलग लग रहा है।" वो आंखें बंद किए सिर हिलाने लगे। बोले, "बेटा, यह रविदास बोल रहे हैं। जो एक चर्मकार थे, जिसके घर राम का प्यारा (संत, महात्मा, भक्त, ज्ञानी महापुरुष जो भगवान को प्यारे हैं) आए।"
मैं रुक गया। चर्मकार? और राम? पिताजी ने कहा, "हां बेटा, रविदास जूते सिलते थे। और उनके घर राम आए। सोचो।"
भजन
आज दिवस लेऊँ बलिहारा।
मेरे घर आया रामका प्यारा ॥टेक॥
आँगन बँगला भवन भयो पावन।
हरिजन बैठे हरिजस गावन ॥१॥
करूँ डंडवत चरन पखारूँ।
तन-मन-धन उन उपरि वारूँ ॥२॥
कथा कहै अरु अरथ बिचारैं।
आप तरैं औरन को तारैं ॥३॥
कह रैदास मिलैं निज दासा।
जनम जनमकै काटैं पासा ॥४॥
रविदास — बनारस की गली में एक आदमी जिसने दीवार तोड़ दी
जब मैंने पहली बार जाना कि यह भजन रविदास ने लिखा है, तो मुझे हैरानी हुई। वही रविदास जिन्होंने चर्म का काम किया, जूते सिले, और फिर भी उनके घर भक्त लोग आए।
कभी-कभी मैं कल्पना करता हूं कि बनारस की किसी गली में रविदास बैठे होंगे। हथेली पर चमड़ा, सुई-धागा। कोई गुज़रता, नाक सिकोड़ता। कोई रुकता, कुछ नहीं कहता। लेकिन रविदास जानते थे कि उनके पास क्या है। उनके मन में कौन बैठा था।
रविदास 15वीं सदी में बनारस में रहे। मीरा उनकी शिष्या थीं। सोचो — एक राजकुमारी, और एक चर्मकार। यही तो भारत की खूबसूरती है। जाति नहीं, भाव देखा जाता है। रविदास ने एक बात कही जो मुझे आज भी याद है — "जाति-पाति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।" कोई जाति नहीं पूछता, जो हरि को भजे वो हरि का है। यह बात उस जमाने में, जब समाज में भेदभाव गहरा था।
मुझे नहीं पता कि रविदास ने यह भजन कब लिखा। शायद किसी शाम को, जब कोई हरिजन उनके घर आया था। शायद किसी सुबह, जब उन्हें लगा कि आज कुछ अलग है। लेकिन जब भी लिखा हो, उसमें एक खुशी है जो सदियों बाद भी टूटती नहीं।
इस भजन में रविदास क्या कह रहे हैं?
"आज दिवस लेऊँ बलिहारा, मेरे घर आया रामका प्यारा"
यह पहली पंक्ति सुनते ही कुछ होता है। रविदास कहते हैं — आज का दिन मैं बलि जाऊं, कुर्बान जाऊं। क्यों? क्योंकि मेरे घर राम का प्यारा महात्मा लोग आए है। मैंने एक बार पूछा, "पिताजी, राम खुद क्यों नहीं आए?" वो हंसे। बोले, "बेटा, राम का प्यारा आया, इसका मतलब राम की कृपा आई। कभी-कभी प्रभु खुद नहीं आते, अपना संदेश भेज देते हैं।"
आज लगता है कि यह बात कितनी गहरी है। हम सब कुछ बड़ा चाहते हैं — बड़ा घर, बड़ी नौकरी, बड़ी मुलाकात। लेकिन रविदास कहते हैं कि राम का प्यारा आया, बस। यही काफी है। कभी-कभी मुझे लगता है कि हम अपनी ज़िंदगी में इतनी बड़ी चीज़ें ढूंढते रहते हैं कि छोटी खुशियां हाथ से निकल जाती हैं। रविदास ने शायद यही सिखाया — कि आज का दिन काफी है, अगर उसमें कुछ सच्चा हो।
"आँगन बँगला भवन भयो पावन, हरिजन बैठे हरिजस गावन"
अब रविदास अपने घर का वर्णन करते हैं। आंगन, बंगला, भवन — सब पावन हो गया। हरिजन बैठे, हरिजस गावन — राम के भक्त बैठे हैं, राम का जस गा रहे हैं। मैंने एक बार हमारे पुराने घर को देखा। छोटा सा, दो कमरे, एक आंगन। पिताजी कहते थे, "यह आंगन जब भजन से भर जाता था, तो मुझे लगता था कि मैं किसी राजमहल में हूं।" आज समझ आता है कि वो क्या कह रहे थे।
शायद रविदास का घर भी ऐसा ही था। कोई महल नहीं, कोई बंगला नहीं। लेकिन जब हरिजन बैठे, तो वही झोपड़ी बंगला बन गई। यह भक्ति की शक्ति है। या शायद यह प्रेम की शक्ति है — जब तुम्हारे घर कोई आता है जिसे तुम चाहते हो, तो वो घर अपने आप बदल जाता है।
"करूँ डंडवत चरन पखारूँ, तन-मन-धन उन उपरि वारूँ"
रविदास कहते हैं — मैं डंडवत करूं, चरण धोऊं, तन-मन-धन सब उन पर वार दूं। मैंने एक बार पूछा, "पिताजी, क्या हमें भी सब कुछ दे देना चाहिए?" वो बोले, "बेटा, 'देना' का मतलब 'खो देना' नहीं। जब तुम किसी को देते हो, तो वो तुम्हारा हो जाता है। रविदास ने जब सब कुछ राम को दिया, तो राम उनके हो गए।"
मुझे अब भी यह बात पूरी तरह समझ नहीं आती। कैसे देना खोना नहीं होता? लेकिन कभी-कभी जब मैं किसी को कुछ देता हूं — वक्त, ध्यान, एक सुनने वाला कान — तो पता चलता है कि वो चीज़ मुझसे जुड़ जाती है। शायद रविदास यही कह रहे थे। तन-मन-धन देना, यह खाली हाथ होना नहीं, भरा हुआ होना है।
"कथा कहै अरु अरथ बिचारैं, आप तरैं औरन को तारैं"
अब रविदास एक बड़ी बात कहते हैं। जो हरिजन आए हैं, वो कथा कहते हैं, अर्थ विचारते हैं। और फिर — आप तरें, औरों को तारें। शाम को नीम के पेड़ के नीचे हमारे पड़ोसी श्यामलाल जी बच्चों को रामायण सुनाते थे। बहुत गरीब आदमी थे, हमेशा एक धोती पहने रहते थे, बाल सफेद हो गए थे लेकिन आंखें चमकती थीं। उनकी आवाज़ में कुछ था। पिताजी कहते थे, "देखो बेटा, वो आदमी खुद भी तर रहा है, और औरों को भी तार रहे है। यही रविदास की बात है।"
मुझे लगता है कि यह भजन का सबसे मुश्किल हिस्सा है। खुद तरना आसान है। औरों को तारना मुश्किल। लेकिन रविदास कहते हैं कि असली भक्त वो है जो दोनों करे। शायद इसीलिए हरिजन उनके घर आए — क्योंकि रविदास खुद भी तर रहे थे, और औरों को भी तार रहे थे। यह कोई एकतरफा रास्ता नहीं, यह दोहरा रास्ता है।
"कह रैदास मिलैं निज दासा, जनम जनमकै काटैं पासा"
अंत में रविदास अपना नाम लेते हैं। मिलैं निज दासा — मुझे अपना दास बना लो। जनम जनमकै काटैं पासा — जन्म-जन्म का पासा काट दो। पिताजी कहते थे, "पासा का मतलब है जुआ, जोखिम, अनिश्चितता। रविदास कहते हैं कि इस जन्म-जन्म के खेल को खत्म कर दो। मुझे अपना बना लो, बस।"
कभी-कभी मैं सोचता हूं कि रविदास ने यह क्यों कहा। क्या उन्हें लगता था कि यह जीवन एक जुआ है? शायद हां। कभी जीत, कभी हार, कभी खुशी, कभी गम। और रविदास कहते हैं कि इस खेल को खत्म करो। मुझे अपना दास बना लो, और मैं तुम्हें इस खेल से बाहर निकालूंगा। यह शायद सबसे बड़ी मांग है — जन्म-जन्म के खेल से छुटकारा।
रविदास की बात आज भी दिल को क्यों छूती है?
रविदास ने हमें सिखाया कि घर का आकार मायने नहीं रखता। उनका घर झोपड़ी थी, लेकिन जब हरिजन आए, तो बंगला बन गया। लोग बड़ा घर बनाते हैं, लेकिन भजन नहीं करते। रविदास ने दिखाया कि असली बंगला भजन से बनता है। मुझे नहीं पता कि यह सच है या नहीं, लेकिन जब मैं अपने छोटे से घर में बैठता हूं और कोई पुराना दोस्त आता है, तो वो घर बड़ा लगने लगता है। शायद यही रविदास कह रहे थे।
समर्पण में कोई कमी मत रखो। तन-मन-धन — तीनों चीजें। रविदास कहते हैं कि जो कुछ है, सब दे दो। यह "देना" खोना नहीं, पाना है। जब तुम सब कुछ दे देते हो, तो वो तुम्हारा हो जाता है। मुझे अब भी यह बात पूरी तरह समझ नहीं आती। लेकिन कभी-कभी जब मैं किसी को कुछ देता हूं, तो पता चलता है कि वो चीज़ मुझसे जुड़ जाती है।
पहले खुद तरो, फिर औरों को तारो। यह भक्ति का सबसे ऊंचा स्तर है। जो खुद भी तर रहा है, और हमें भी तार रहा है। श्यामलाल जी रोज़ बच्चों को रामायण सुनाते थे, और खुद भी रोज़ कुछ नया सीखते थे। यही रविदास की बात है। शायद इसीलिए हरिजन उनके घर आए — क्योंकि रविदास खुद भी तर रहे थे।
और सबसे बड़ी बात — जाति-पाति से ऊपर उठो। रविदास चर्म का काम करते थे, लेकिन उनके घर मीराबाई आए। मीरा उनकी शिष्या बनीं। कोई भी हो सकता है गुरु, बस भाव सच्चा हो। शायद इसीलिए संत बार-बार कमल का रूपक चुनते हैं। कीचड़ में खिलता है, लेकिन कीचड़ उसका हिस्सा नहीं बनती। मुझे नहीं पता कि यह सच है या नहीं, लेकिन कभी-कभी जब मैं किसी मुश्किल हालत में रहता हूं, तो कोशिश करता हूं कि वो हालत मेरा हिस्सा न बने। शायद यही कमल की सीख है।
यह भजन किस राग में गाया जाता है?
यह भजन अक्सर भैरवी या देश राग में गाया जाता है। सबसे ज़्यादा जो इसे गाया, वो पंडित कुमार गंधर्व जी हैं। उनकी आवाज़ में यह भजन एक अलग ही जान पा गया। मैंने एक बार उनकी रिकॉर्डिंग सुनी थी, हमारे पुराने टेप रिकॉर्डर पर। बीच-बीच में कैसेट अटक जाती थी, पिताजी पेंसिल डालकर घुमाते थे, फिर वही आवाज़ फिर से भर जाती थी। उस आवाज़ में यह पंक्ति आई — आज दिवस लेऊँ बलिहारा। मुझे लगा कि कोई बनारस की गली से आकर मेरे कमरे में बैठ गया है।
यह भजन इतना प्रसिद्ध क्यों है?
भाषा सरल है। कोई कठिन शब्द नहीं। रविदास ने जानबूझकर सरल भाषा चुनी। जो सरल हो, वो लंबा चलता है। मुझे लगता है कि यह सबसे बड़ा कारण है। कोई भी इसे गा सकता है, कोई भी इसे समझ सकता है। और जब कोई चीज़ सबकी हो जाती है, तो वो सदियों तक जीती है।
हर किसी की कहानी है। एक गरीब आदमी, जिसके घर राम आए। यह आशा देती है। जब लगे कि हमारा घर छोटा है, हमारा काम छोटा है, तब रविदास याद आते हैं। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि रविदास ने यह भजन किसके लिए लिखा। शायद अपने लिए, शायद उनके लिए जो उनके घर आते थे, शायद हम सबके लिए। जो भी हो, यह आज भी काम करता है।
और वो आवाज़ — आज दिवस लेऊँ बलिहारा। यह कोई साधारण गान नहीं, यह दिल से निकली खुशी है। जब कोई अपने घर आए, तो यही होता है न? बलिहारा जाना, कुर्बान जाना। मुझे नहीं पता कि रविदास ने इसे कैसे गाया होगा। शायद हल्की आवाज़ में, शायद जोर से, शायद रोते हुए, शायद हंसते हुए। लेकिन जब भी मैं इसे गाता हूं, तो मेरी आंखें नम हो जाती हैं। शायद यही असली भजन है।
अंत में...
पिताजी की एक आदत थी। हर सुबह, नहाने से पहले, वो इस भजन का टेक गाते थे। आज दिवस लेऊँ बलिहारा... मैंने कभी पूछा नहीं क्यों। शायद उन्हें लगता था कि दिन की शुरुआत इससे बेहतर नहीं हो सकती।
आज, जब मैं अपने बरामदे में बैठता हूं, सुबह की ठंडी हवा में, तो कभी-कभी मेरी आवाज़ निकल जाती है। और फिर लगता है कि पिताजी कहीं पास ही हैं, अपनी चारपाई पर, आंखें बंद किए, मुस्कुरा रहे हैं।
रविदास ने कहा था — जनम जनमकै काटैं पासा। जन्म-जन्म का पासा काट दो। शायद पिताजी ने भी यही मांगी थी। और शायद राम ने सुन भी ली। क्योंकि जब मैं यह भजन गाता हूं, तो मेरे दिल में कुछ रुक जाता है। कुछ जो शब्दों में नहीं आ सकता, लेकिन महसूस होता है।
मुझे नहीं पता कि मैं सच में समझ पाया हूं रविदास को या नहीं। लेकिन कभी-कभी जब मैं अपने छोटे से घर में बैठता हूं और कोई पुराना दोस्त आता है, तो वो घर बड़ा लगने लगता है। और मुझे लगता है कि शायद, बस शायद, मैं भी थोड़ा सा रविदास को समझ पाया हूं।
आज दिवस लेऊँ बलिहारा, मेरे घर आया रामका प्यारा...
