संतों की वाणी की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वे जीवन के गहरे से गहरे सत्य को भी सरल शब्दों में कह देते हैं। स्वामी ब्रह्मानंद जी का प्रसिद्ध भजन "मैं तो रमता जोगी राम" ऐसा ही एक भजन है। पहली बार सुनने पर इसकी पंक्तियां बहुत साधारण लगती हैं, लेकिन जब इनके अर्थ पर मनन किया जाए तो पता चलता है कि यह भजन केवल वैराग्य का गीत नहीं, बल्कि जीवन की नश्वरता और परम सत्य का स्मरण है।
मुझे अपने पिताजी की एक बात अक्सर याद आती है। वे कहा करते थे, "जिस चीज़ को हम जीवन भर अपना समझकर पकड़कर बैठे रहते हैं, एक दिन वही हमें छोड़कर चली जाती है।" जब भी मैं यह भजन पढ़ता हूं, उनकी यह बात भीतर कहीं गूंजने लगती है।
भजन पाठ
«मैं तो रमता जोगी राम,
मेरा क्या दुनियां से काम ॥»
«हाडमांस से बनी पुतलिया,
ऊपर जडिया चाम,
देख देख सब लोक रिझावें,
मेरो मन उपराम ॥»
«माल खजाने बाग़ बगीचे,
सुन्दर महल मुकाम,
एक पल में सबही छूटें,
संग चले नहि दाम ॥»
«मात पिता अरु मीत पियारे,
भाई बंधु सुतवाम,
स्वारथ का सब खेल बना है,
नही इनमें आराम ॥»
«दिन दिन पलपल छिनछिन काया,
छीजत जाय तमाम,
ब्रह्मानंद भजन कर प्रभु का,
मैं पावूं बिश्राम ॥»
---
Hinglish Lyrics
Main To Ramta Jogi Ram
Mera Kya Duniya Se Kaam
Haad-Maans Se Bani Putaliya,
Upar Jadiya Chaam,
Dekh Dekh Sab Log Rijhaaven,
Mero Man Uparam.
Maal Khazane Baag-Bagiche,
Sundar Mahal Mukaam,
Ek Pal Mein Sabhi Chhootein,
Sang Chale Nahi Daam.
Maat Pita Aru Meet Piyaare,
Bhai Bandhu Sutvaam,
Swaarath Ka Sab Khel Bana Hai,
Nahi Inmein Aaraam.
Din Din Pal-Pal Chhin-Chhin Kaaya,
Chheejat Jaay Tamaam,
Brahmanand Bhajan Kar Prabhu Ka,
Main Paavun Bishraam.
भजन का भावार्थ
"मैं तो रमता जोगी राम, मेरा क्या दुनियां से काम"
भजन की पहली ही पंक्ति में स्वामी ब्रह्मानंद जी अपने जीवन का सार बता देते हैं। वे कहते हैं कि मैं तो राम के नाम में रमने वाला एक साधक हूं। संसार की दौड़, प्रतिस्पर्धा, मान-सम्मान और संग्रह की प्रवृत्ति अब मेरे लिए आकर्षण का विषय नहीं रही।
यह संसार से भागने की बात नहीं है, बल्कि उसके मोह से ऊपर उठने की बात है।
"हाडमांस से बनी पुतलिया..."
संत जी शरीर की वास्तविकता समझाते हैं। जिस देह पर मनुष्य इतना गर्व करता है, वह हाड़-मांस और चमड़ी से बनी एक अस्थायी रचना मात्र है।
आज के समय में लोग सुंदर दिखने के लिए घंटों आईने के सामने खड़े रहते हैं, लेकिन शायद ही कभी यह सोचते हों कि शरीर नश्वर है। संत हमें शरीर का तिरस्कार नहीं, बल्कि उसकी वास्तविकता का बोध कराते हैं।
"माल खजाने बाग़ बगीचे..."
धन, संपत्ति, महल, जमीन-जायदाद — सब यहीं रह जाने वाले हैं।
एक गांव के बुजुर्ग कहते थे, "कफन में जेब नहीं होती।" उस समय यह बात मजाक जैसी लगती थी, लेकिन उम्र के साथ उसका अर्थ समझ आने लगता है। मनुष्य पूरी जिंदगी जोड़ता रहता है, पर अंतिम यात्रा में उसके साथ केवल कर्म जाते हैं।
"मात पिता अरु मीत पियारे..."
यहां संत ब्रह्मानंद जी रिश्तों का विरोध नहीं कर रहे। वे केवल उनकी सीमा बता रहे हैं।
माता-पिता, मित्र, भाई-बहन और संतान जीवन की अनमोल पूंजी हैं, लेकिन अंततः हर व्यक्ति को अपनी आध्यात्मिक यात्रा स्वयं पूरी करनी होती है। रिश्ते सहारा दे सकते हैं, लेकिन आत्मिक शांति भीतर से ही प्राप्त होती है।
"दिन दिन पलपल छिनछिन काया..."
यह पंक्ति पूरे भजन का सबसे मार्मिक भाग है।
समय लगातार बीत रहा है। शरीर हर दिन थोड़ा-थोड़ा क्षीण हो रहा है। हम अक्सर सोचते हैं कि अभी बहुत समय है, लेकिन जीवन की घड़ी बिना रुके चलती रहती है।
इसीलिए संत ब्रह्मानंद जी कहते हैं कि अंततः विश्राम केवल प्रभु-स्मरण में है।
इस भजन का गूढ़ संदेश
पहली नजर में यह भजन वैराग्य का भजन लगता है, लेकिन इसका गहरा संदेश इससे भी आगे जाता है।
स्वामी ब्रह्मानंद जी यह नहीं कह रहे कि धन छोड़ दो, परिवार छोड़ दो या संसार छोड़कर जंगल चले जाओ। वे कह रहे हैं कि इन सबके बीच रहते हुए भी अपने भीतर प्रभु का स्मरण बनाए रखो।
कमल का फूल पानी में रहता है, लेकिन पानी उसे भिगो नहीं पाता। उसी प्रकार मनुष्य संसार में रहे, लेकिन संसार उसके भीतर न बस जाए।
यही इस भजन का सबसे गहरा संदेश है।
यह भजन आज भी क्यों प्रासंगिक है?
आज का मनुष्य पहले से अधिक व्यस्त है।
मोबाइल, सोशल मीडिया, करियर, प्रतियोगिता, आर्थिक दबाव और दिखावे की संस्कृति ने मन को लगातार बाहर की ओर दौड़ाया हुआ है। हम पहले से अधिक जुड़े हुए दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर से पहले से अधिक बेचैन भी हैं।
ऐसे समय में यह भजन हमें रुककर पूछने पर मजबूर करता है
"जिसके पीछे मैं भाग रहा हूं, क्या वह सच में मेरे साथ जाने वाला है?"
यही प्रश्न इस भजन को आज भी प्रासंगिक बनाता है।
इस भजन से क्या शिक्षा मिलती है?
1. शरीर पर अभिमान न करें
शरीर ईश्वर का दिया हुआ साधन है, लेकिन यह स्थायी नहीं है। इसलिए सुंदरता और शक्ति पर अहंकार करना उचित नहीं।
2. धन आवश्यक है, अंतिम लक्ष्य नहीं
जीवनयापन के लिए धन जरूरी है, लेकिन केवल धन के पीछे भागते रहना अंततः खालीपन देता है।
3. रिश्तों को निभाएं, उनमें खो न जाएं
रिश्ते जीवन को सुंदर बनाते हैं, लेकिन परम शांति का स्रोत केवल आत्मिक जागृति है।
4. समय का मूल्य समझें
जीवन का प्रत्येक दिन हमें हमारी मंजिल के करीब ले जा रहा है। इसलिए समय को व्यर्थ गंवाना सबसे बड़ी हानि है।
5. प्रभु-स्मरण ही वास्तविक विश्राम है
बाहरी सुविधाएं आराम दे सकती हैं, लेकिन मन का विश्राम केवल ईश्वर-स्मरण और आत्मिक शांति से मिलता है।
स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज का संक्षिप्त परिचय
स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज भारतीय संत परंपरा के एक ब्रह्मनिष्ठ परमहंस, संत-कवि और आध्यात्मिक चिंतक थे। उन्होंने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और आत्मचिंतन को सरल भाषा में जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया।
उनकी प्रमुख रचनाओं में "श्री ब्रह्मानंद भजनमाला", "ब्रह्मानंद मोक्ष गीता" तथा "ईश्वर दर्शनम्" विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनकी वाणी में गुरु-भक्ति, प्रभु-स्मरण, जीवन की नश्वरता और आत्मकल्याण का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
इसी कारण उनके भजन आज भी संत-मंडलियों, सत्संगों और भजन-कीर्तन में बड़े प्रेम से गाए जाते हैं।
यह भजन किस राग में गाया जाता है?
स्वामी ब्रह्मानंद जी के भजनों की विभिन्न परंपराओं में अलग-अलग धुनें प्रचलित हैं। "मैं तो रमता जोगी राम" को प्रायः लोक-भजन शैली में गाया जाता है और कई गायक इसे राग भैरवी के प्रभाव वाली धुन में प्रस्तुत करते हैं।
हालांकि इस भजन की वास्तविक शक्ति इसके शब्दों में है। इसकी वैराग्यपूर्ण अनुभूति ही इसे विशेष बनाती है।
अंत में...
जब भी मैं यह भजन पढ़ता हूं, मुझे अपने पिताजी की कही एक बात याद आती है—
"संसार में रहो, लेकिन संसार को अपने भीतर मत बसने दो। नाव पानी पर रहे तो सुरक्षित रहती है, लेकिन पानी नाव के भीतर आ जाए तो डूब जाती है।"
शायद स्वामी ब्रह्मानंद जी भी यही कहना चाहते थे।
शरीर नश्वर है, धन अस्थायी है, रिश्ते सीमित हैं और समय लगातार बीत रहा है। लेकिन प्रभु का नाम, अच्छे कर्म और सच्चा आत्मचिंतन ऐसे साथी हैं जो जीवन को भी संवारते हैं और अंत समय में भी सहारा बनते हैं।
और शायद इसी कारण यह भजन आज भी सुनने वाले को भीतर तक छू जाता है—
"मैं तो रमता जोगी राम, मेरा क्या दुनियां से काम..."
