मैं उस रात बहुत डरा हुआ था। बुखार था, 104 डिग्री, और मुझे लग रहा था कि कोई मेरे कमरे में है। मां सो रही थीं, पिताजी उठे। मैंने कहा, "पिताजी, कुछ है।" वो बोले, "कुछ नहीं है बेटा, बस तेरा मन है।" लेकिन मुझे पता था कि कुछ है।
फिर पिताजी ने अपनी कुर्सी खींची, मेरे पास बैठे, और एक किताब निकाली। पुरानी सी, किनारे पीले हो गए थे। वो बोले, "बेटा, मैं तुझे कुछ सुनाता हूं। तू सोच मत, बस सुन।"
और फिर उनकी आवाज़ उठी। धीमी, लेकिन कुछ थी उसमें। जैसे कोई दीवार खड़ी हो जाए।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर...
मैंने पूछा, "यह क्या है?" वो बोले, "हनुमान चालीसा। तुलसीदास ने लिखी। 40 पंक्तियां। बस 40। लेकिन जब डर लगे, तो यही काफी है।"
उस रात मैं सो गया। नहीं पता कैसे। लेकिन जब सुबह उठा, तो बुखार उतर गया था। या शायद डर उतर गया था। पिताजी ने कहा, "देखा बेटा, कुछ नहीं था।" मैंने कहा, "हां पिताजी, लेकिन वो 40 पंक्तियां थीं।"
आज, जब भी मुझे को अकेलापन लगता है, तो वही 40 पंक्तियां याद आती हैं। और पिताजी की आवाज़।
हनुमान चालीसा पाठ
दोहा
श्रीगुरु चरन सरोज रज निजमनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
चौपाई
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
महावीर विक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन वरन विराज सुवेसा।
कानन कुण्डल कुंचित केसा।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
काँधे मूँज जनेऊ साजै।।
शंकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग वन्दन।।
विद्यावान गुणी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
विकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे।।
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा।
नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मंत्र विभीषन माना।
लंकेश्वर भये सब जग जाना।।
जुग सहस्र योजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डरना।।
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिनके काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै।।
चारों युग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस वर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुम्हरे भजन राम को भावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै।।
अन्त काल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
जै जै जै हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो सत बार पाठ कर कोई।
छूटहिं बंदि महा सुख होई।।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा।।
दोहा
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
Hanuman Chalisa — hinglish mein
Doha
Shri guru charan saroj raj, nij manu mukuru sudhari।
Barnau raghubar bimal jasu, jo dayaku phal chari।।
Buddhiheen tanu janike, sumirau pavan-kumar।
Bal buddhi vidya dehu mohi, harahu kalesa bikar।।
Chaupai
Jai hanuman gyan gun sagar।
Jai kapis tihu lok ujagar।।
Ram doot atulit bal dhama।
Anjani-putra pavan sut nama।।
Mahavir vikram bajrangi।
Kumati nivar sumati ke sangi।।
Kanchan varan viraj subesa।
Kanan kundal kunchit kesa।।
Hath bajra au dhvaja birajai।
Kandhe munj janeu sajai।
Shankar suvan kesarinandan।
Tej pratap maha jag vandan।।
Vidyavan guni ati chatur।
Ram kaj karibe ko atur।।
Prabhu charitra sunibe ko rasiya।
Ram lakhan sita man basiya।।
Sukshma roop dhari siyahi dikhava।
Vikat roop dhari lanka jarava।।
Bhim roop dhari asur sanhare।
Ramchandra ke kaj sanvare।।
Lay sanjivan lakhana jiyaye।
Shri raghubir harashi ur laye।।
Raghupati kinhi bahut badai।
Tum mam priya bharat-hi sam bhai।।
Sahas badan tumharo jas gavai।
As kahi shripati kanth lagavai।।
Sanakadik brahmadik munisha।
Narad sarad sahit ahisa।।
Jam kuber digpal jahan te।
Kavi kovid kahi sake kahan te।।
Tum upkar sugrahin kinha।
Ram milay raj pad dinha।।
Tumharo mantra vibhishan mana।
Lankeshvar bhaye sab jag jana।।
Jug sahasra yojan par bhanu।
Lilyo tahi madhur phal janu।।
Prabhu mudrika meli mukha mahin।
Jaldhi langhi gaye acharaj nahin।।
Durgam kaj jagat ke jete।
Sugam anugrah tumhare tete।।
Ram duare tum rakhvare।
Hot na agya binu paisare।।
Sab sukh lahe tumhari sarna।
Tum rakshak kahu ko darna।।
Aapan tej samharo apai।
Teeno lok hank te kanpai।।
Bhoot pisach nikat nahin aavai।
Mahavir jab naam sunavai।।
Nasai rog harai sab pira।
Japat nirantar hanumat bira।।
Sankat te hanuman chhudavai।
Man kram vachan dhyan jo lavai।।
Sab par ram tapasvi raja।
Tinke kaj sakal tum saja।
Aur manorath jo koi lavai।
Soi amit jeevan phal pavai।।
Charo yug paratap tumhara।
Hai parasiddh jagat ujiyara।।
Sadhu-sant ke tum rakhvare।
Asur nikandan ram dulare।।
Ashta siddhi nau nidhi ke data।
As var deen janaki mata।।
Ram rasayan tumhare pasa।
Sada raho raghupati ke dasa।।
Tumhare bhajan ram ko bhaavai।
Janam-janam ke dukh bisravai।।
Anta kaal raghubar pur jaai।
Jahan janma hari-bhakt kahai।।
Aur devata chitt na dharai।
Hanumat sei sarva sukh karai।।
Sankat katai mitai sab pira।
Jo sumirai hanumat balbira।।
Jai jai jai hanuman gosain।
Kripa karahu gurudev ki nai।।
Jo sat bar path kar koi।
Chhutahin bandi maha sukh hoi।।
Jo yah padhai hanuman chalisa।
Hoy siddhi sakhi gaurisa।।
Tulsi das sada hari chera।
Kijai nath hriday mahin dera।।
Doha
Pavan tanay sankat haran, mangal murti rup।
Ram lakhan sita sahit, hriday basahu sur bhup।।
तुलसीदास — जिन्होंने डर के वक्त एक दीवार खड़ी की
तुलसीदास का जन्म 1532 में हुआ, राजापुर या सोरों में। बचपन में ही मां-बाप छूट गए। लोग कहते हैं कि वह बोल नहीं सकते थे, जब तक एक संत ने उन्हें राम नाम नहीं दिया। फिर जो बोले, वो सोना बोले। वाराणसी में रहे, रामचरितमानस लिखी, और फिर यह चालीसा। पिताजी कहते थे, "बेटा, रामचरितमानस तो बड़ी किताब है, लेकिन यह चालीसा छोटी है। और छोटी चीज़ें ज़्यादा काम आती हैं। जैसे छोटी दवा ज़्यादा असर करती है।"
मैंने एक बार पूछा, "पिताजी, यह चालीसा क्यों लिखा?" वो बोले, "बेटा, कहते हैं कि तुलसीदास बहुत बीमार थे। कोई ठीक नहीं कर पाया। फिर उन्होंने हनुमान जी का ध्यान किया, और यह 40 पंक्तियां निकलीं। बस। बीमारी चली गई।" मैंने कहा, "पिताजी, यह सच है?" वो मुस्कुराए। बोले, "बेटा, जब तू डरा हुआ था, तो क्या सच था?"
इस चालीसा में तुलसीदास क्या कह रहे हैं?
"जय हनुमान ज्ञान गुन सागर"
पहली पंक्ति सुनते ही कुछ होता है। तुलसीदास कहते हैं — जय हनुमान, ज्ञान और गुणों का सागर। पिताजी कहते थे, "बेटा, 'सागर' का मतलब है कि हनुमान जी में ज्ञान और गुण इतने हैं कि कोई गिन नहीं सकता। जैसे समुद्र में पानी, गिन नहीं सकते।"
मैंने एक बार पूछा, "पिताजी, हमें भी इतना ज्ञान चाहिए?" वो बोले, "नहीं बेटा, हमें सिर्फ इतना चाहिए कि हमें पता हो कि हनुमान जी में इतना है। बाकी वो देख लेंगे।"
"रामदूत अतुलित बल धामा"
अब तुलसीदास हनुमान जी का परिचय देते हैं। राम के दूत, अतुलित बल के धाम। अंजनी के पुत्र, पवन के पुत्र। पिताजी कहते थे, "बेटा, 'रामदूत' बहुत मायने रखता है। हनुमान जी राम के दूत हैं। इसलिए जब हम हनुमान जी को बुलाते हैं, तो राम भी साथ आते हैं। यह कोई अलग बात नहीं, यह एक ही बात है।"
"महावीर विक्रम बजरंगी"
महावीर — बहादुर, विक्रम — पराक्रमी, बजरंगी — बज्र के समान मजबूत। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह तीनों नाम एक ही आदमी के हैं। लेकिन हर नाम में एक अलग रंग है। महावीर में बहादुरी, विक्रम में चतुराई, बजरंगी में मजबूती। हनुमान जी में तीनों हैं।"
"कंचन वरन विराज सुवेसा"
स्वर्ण वर्ण, सुंदर वेश। कान में कुंडल, केश कुंचित। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह रूप का वर्णन है। लेकिन यह सिर्फ रूप नहीं, यह तेज है। जब हनुमान जी आते हैं, तो उनका तेज पहले आता है, रूप बाद में।"
"हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै"
हाथ में बज्र, ध्वजा। कंधे पर मूंज की जनेऊ। पिताजी कहते थे, "बेटा, बज्र मतलब मजबूती, ध्वजा मतलब विजय। और जनेऊ मतलब ब्राह्मणत्व, ज्ञान। हनुमान जी में शक्ति भी है, विजय भी है, ज्ञान भी है।"
"शंकर सुवन केसरीनंदन"
शंकर के अवतार, केसरी के नंदन। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह बहुत गहरी बात है। हनुमान जी शिव जी के अवतार हैं। इसलिए उनमें शिव जी का तेज है। और केसरी के पुत्र होने से वानर राज का गौरव भी है।"
"विद्यावान गुणी अति चातुर"
विद्या में निपुण, गुणी, बहुत चतुर। पिताजी कहते थे, "बेटा, हनुमान जी सिर्फ बलवान नहीं, बुद्धिमान भी हैं। यह बात याद रखना। जब बल काम न आए, तब बुद्धि काम आती है। और हनुमान जी में दोनों हैं।"
"राम काज करिबे को आतुर"
राम के काम करने में आतुर। पिताजी कहते थे, "बेटा, 'आतुर' का मतलब है बेचैन। हनुमान जी राम के काम करने के लिए बेचैन रहते हैं। यह प्रेम की सबसे बड़ी निशानी है — बेचैनी।"
"प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया"
प्रभु के चरित्र सुनने में रसिक। राम, लक्ष्मण, सीता — मन में बसे हैं। पिताजी कहते थे, "बेटा, हनुमान जी रामायण सुनने में भी रस लेते हैं। जो खुद रामायण में हैं, वो भी रामायण सुनना चाहते हैं। यह प्रेम है — बार-बार सुनना, बार-बार कहना।"
"सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा"
सूक्ष्म रूप धारण कर सीता जी को दिखाया। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह लंका कांड की बात है। हनुमान जी छोटे होकर गए, सीता जी को अंगूठी दिखाई। यह चतुराई है — कब बड़े होना, कब छोटे।"
"विकट रूप धरि लंक जरावा"
विकट रूप धारण कर लंका जलाई। पिताजी कहते थे, "बेटा, वही हनुमान जी जो छोटे होकर गए, वो बड़े होकर लंका जला दी। यह हनुमान जी की विराटता है — कब शांत, कब प्रचंड।"
"भीम रूप धरि असुर संहारे"
भीम रूप धारण कर असुरों का संहार। रामचंद्र के काम संवारे। पिताजी कहते थे, "बेटा, यहां 'भीम' का मतलब है डरावना, विशाल। हनुमान जी ने राक्षसों को मारा, लेकिन राम जी का काम संवारा। यह युद्ध नहीं, यह सेवा है।"
"लाय सजीवन लखन जियाये"
संजीवनी लाकर लक्ष्मण जी को जिलाया। श्री रघुबीर ने हर्ष में उर लगाया। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह सबसे बड़ी घटना है। लक्ष्मण जी मरे, हनुमान जी पूरा पर्वत उठाकर लाए। राम जी ने हर्ष में उन्हें सीने लगाया। यह प्रेम है — जान की बाजी लगा देना।"
"रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई"
रघुपति ने बहुत बड़ाई की। तुम मम प्रिय भरत ही सम भाई। पिताजी कहते थे, "बेटा, राम जी ने हनुमान जी को अपने भरत जैसा प्रिय कहा। भरत जो राम जी के चरणों की धूल को अपना राज्य मानते थे। यह प्रेम की सबसे ऊंची मिसाल है।"
"सहस बदन तुम्हरो जस गावैं"
हजार मुख वाले तुम्हारा यश गाएं। ऐसा कहकर श्रीपति ने कंठ लगाया। पिताजी कहते थे, "बेटा, 'सहस्र बदन' का मतलब है हजार मुख। शेषनाग के हजार फन हैं। वो भी हनुमान जी का यश नहीं गा सकते। और राम जी ने ऐसे हनुमान जी को कंठ लगाया।"
"सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा"
सनक आदि, ब्रह्मा आदि, मुनियों के राजा। नारद, सरस्वती, सहित अहीसा। पिताजी कहते थे, "बेटा, यहां सब देवता आ गए। सनकादिक ऋषि, ब्रह्मा जी, नारद जी, सरस्वती जी। सब हनुमान जी का यश गा रहे हैं।"
"जम कुबेर दिगपाल जहां ते"
यम, कुबेर, दिशाओं के पालक। कवि कोविद कह सके कहां ते। पिताजी कहते थे, "बेटा, यमराज भी, कुबेर भी, सब दिशाओं के रक्षक भी। सब हनुमान जी का यश नहीं गा सकते। कवि और विद्वान क्या कहें?"
"तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा"
सुग्रीव का उपकार किया। राम से मिलाया, राजपद दिया। पिताजी कहते थे, "बेटा, हनुमान जी ने सुग्रीव की मदद की। राम जी से मिलाया, फिर राजा बनाया। यह हनुमान जी का स्वभाव है — दूसरों का भला करना।"
"तुम्हरो मंत्र विभीषन माना"
तुम्हारा मंत्र विभीषण ने माना। लंकेश्वर भये, सब जग जाना। पिताजी कहते थे, "बेटा, विभीषण ने हनुमान जी की बात मानी। राम जी की शरण में आए। और फिर लंका के राजा बने। यह हनुमान जी की बुद्धि है — दुश्मन को भी मित्र बनाना।"
"जुग सहस्र योजन पर भानू"
जुग सहस्र योजन दूर सूर्य। लील्यो ताहि मधुर फल जानू। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह बाल हनुमान जी की लीला है। उन्होंने सूर्य को फल समझकर खाने चले गए। इंद्र ने वज्र मारा, हनुमान जी गिरे। लेकिन पवन देव ने उन्हें उठाया। यह बाल लीला है — मासूमियत और शक्ति दोनों।"
"प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं"
प्रभु की मुद्रिका मुख में डाली। समुद्र लांघ गए, अचरज नहीं। पिताजी कहते थे, "बेटा, हनुमान जी ने मुद्रिका मुख में रखी और समुद्र लांघ गए। अचरज नहीं — कोई आश्चर्य नहीं। क्योंकि हनुमान जी के लिए यह सब साधारण है।"
"दुर्गम काज जगत के जेते"
दुर्गम काम जगत में जितने। सुगम अनुग्रह तुम्हारे तेते। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह सबसे बड़ी बात है। जो काम दुर्गम है, कठिन है, वो हनुमान जी की कृपा से सुगम हो जाता है। यह हर किसी के काम आती है।"
"राम दुआरे तुम रखवारे"
राम के द्वार पर तुम रखवाले। बिना आज्ञा कोई न जा सके। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह बहुत मायने रखता है। हनुमान जी राम के द्वार के रखवाले हैं। इसलिए जब हम हनुमान जी को बुलाते हैं, तो राम तक पहुंचना आसान हो जाता है।"
"सब सुख लहै तुम्हारी सरना"
तुम्हारी शरण में सब सुख मिलते हैं। तुम रक्षक हो, किसी को डर क्या। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह वो पंक्ति है जो मैंने तुझे सिखाई थी। जब डर लगे, तो यही पढ़ना।"
"आपन तेज सम्हारो आपै"
अपना तेज आप ही संभालो। तीनों लोक कांप उठें। पिताजी कहते थे, "बेटा, हनुमान जी का तेज इतना है कि तीनों लोक कांप उठें। लेकिन वो अपना तेज संभाले रहते हैं। यह विनम्रता है — शक्ति होने पर भी शांत रहना।"
"भूत पिसाच निकट नहिं आवै"
भूत-पिशाच पास नहीं आते। महावीर जब नाम सुनावै। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह वो पंक्ति है जो उस रात काम आई। जब तुझे लग रहा था कि कुछ है, तो मैंने यही पढ़ी।"
"नासै रोग हरै सब पीरा"
रोग नष्ट होते, सब पीड़ा हरती। निरंतर जपने से हनुमान वीरा। पिताजी कहते थे, "बेटा, यहां 'निरंतर' बहुत मायने रखता है। रोज़ पढ़ो, हर रोज़। एक दिन नहीं, हर दिन।"
"संकट तें हनुमान छुड़ावै"
संकट से हनुमान जी छुड़ाते हैं। मन, कर्म, वचन से ध्यान जो लावै। पिताजी कहते थे, "बेटा, 'मन कर्म वचन' — तीनों से ध्यान लगाओ। सिर्फ मुंह से नहीं, मन से भी, काम से भी।"
"सब पर राम तपस्वी राजा"
सब पर राम तपस्वी राजा। उनके काम सब तुम संवारो। पिताजी कहते थे, "बेटा, राम जी तपस्वी हैं, राजा हैं। और उनके सब काम हनुमान जी संवारते हैं। यह सेवा है — बिना अपना नाम लिए काम करना।"
"और मनोरथ जो कोई लावै"
और जो कोई मनोरथ लाए। अमित जीवन फल पावै। पिताजी कहते थे, "बेटा, 'मनोरथ' का मतलब है मन की इच्छा। जो भी इच्छा लाओ, हनुमान जी पूरी करते हैं। लेकिन ध्यान से लाना।"
"चारों युग परताप तुम्हारा"
चारों युगों में तुम्हारा परताप। जगत में प्रसिद्ध, उजियारा। पिताजी कहते थे, "बेटा, हनुमान जी चारों युगों में हैं। सत्युग, त्रेतायुग, द्वापर, कलियुग — हर युग में।"
"साधु-संत के तुम रखवारे"
साधु-संत के रखवाले। असुरों का नाश, राम के प्यारे। पिताजी कहते थे, "बेटा, हनुमान जी साधुओं की रक्षा करते हैं, और असुरों का नाश। यह दोनों एक साथ — रक्षा और नाश।"
"अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता"
अष्ट सिद्धि, नौ निधि के दाता। यह वरदान जानकी माता ने दिया। पिताजी कहते थे, "बेटा, अष्ट सिद्धि आठ शक्तियां हैं, नौ निधि नौ खजाने। यह सब हनुमान जी में हैं। लेकिन वो कभी अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए इस्तेमाल करते हैं।"
"राम रसायन तुम्हरे पासा"
राम रसायन तुम्हारे पास। सदा रहो रघुपति के दास। पिताजी कहते थे, "बेटा, 'रसायन' का मतलब है अमृत, दवा। राम का नाम ही रसायन है, और यह हनुमान जी के पास है।"
"तुम्हरे भजन राम को भावै"
तुम्हारा भजन राम को भाता है। जन्म-जन्म के दुख बिसराते हैं। पिताजी कहते थे, "बेटा, हनुमान जी का भजन करने से राम प्रसन्न होते हैं। और फिर जन्म-जन्म के दुख मिट जाते हैं।"
"अन्त काल रघुबर पुर जाई"
अंत समय रघुबर के धाम जाते हैं। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहलाते हैं। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह सबसे बड़ी बात है। जो हनुमान जी का भजन करता है, वो अंत में राम के धाम जाता है। और फिर हरि-भक्त कहलाता है।"
"और देवता चित्त न धरई"
और देवताओं को चित्त में न रखे। हनुमान से ही सर्व सुख मिले। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह कोई दूसरे देवताओं का अपमान नहीं। यह तो यह कह रहा है कि हनुमान जी में सब कुछ है।"
"संकट कटै मिटै सब पीरा"
संकट कटते, सब पीड़ा मिटती। जो हनुमान बलबीर का स्मरण करे। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह वो पंक्ति है जो रोज़ पढ़नी चाहिए। जब भी संकट हो, यह याद आनी चाहिए।"
"जै जै जै हनुमान गोसाईं"
जय जय जय हनुमान गोस्वामी। कृपा करो गुरुदेव की नाईं। पिताजी कहते थे, "बेटा, 'गोसाईं' का मतलब है स्वामी, मालिक। और 'गुरुदेव की नाईं' — गुरु की तरह कृपा करो।"
"जो सत बार पाठ कर कोई"
जो सौ बार पाठ करे। बंदी छूटे, महा सुख होए। पिताजी कहते थे, "बेटा, 'सत' का मतलब सौ। लेकिन यह संख्या नहीं, यह पूरा मन लगाकर पढ़ना है।"
"जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा"
जो यह हनुमान चालीसा पढ़े। सिद्धि मिले, गौरीश संकल्प। पिताजी कहते थे, "बेटा, 'साक्षी' का मतलब है गवाह। शिव जी गवाह हैं कि यह सच है।"
"तुलसीदास सदा हरि चेरा"
तुलसीदास सदा हरि का दास। हे नाथ, हृदय में डेरा डालो। पिताजी कहते थे, "बेटा, यहां तुलसीदास अपना नाम लेते हैं। और फिर कहते हैं — हे नाथ, मेरे दिल में आ जाओ। यह सबसे बड़ी प्रार्थना है।"
इस चालीसा से क्या सीख मिलती है?
तुलसीदास ने हमें सिखाया कि डर के वक्त एक ही नाम काफी है। 40 पंक्तियां, लेकिन हर पंक्ति में एक ताकत। पिताजी कहते थे, "बेटा, जब तुझे लगा कि कुछ है, तो मैंने यही पढ़ी। और तू सो गया। यह कोई जादू नहीं, यह विश्वास है।"
हनुमान जी में बल भी है, बुद्धि भी है, भक्ति भी है। यह तीनों एक साथ। पिताजी कहते थे, "बेटा, जीवन में बल चाहिए काम करने के लिए, बुद्धि चाहिए सही काम करने के लिए, और भक्ति चाहिए काम को समर्पित करने के लिए। हनुमान जी में तीनों हैं।"
और सबसे बड़ी बात — हनुमान जी राम के दास हैं। पिताजी कहते थे, "बेटा, यह सबसे ऊंची बात है। जो राम का दास है, वो सबका स्वामी है। हनुमान जी ने दिखाया कि सेवा में ही सब कुछ है।"
यह चालीसा किस राग में गाई जाती है?
यह चालीसा अक्सर भैरवी राग में गाया जाती है। लेकिन पिताजी कहते थे कि इसका कोई एक राग नहीं। जब डर हो, तो कोई भी राग काम आता है। जब खुशी हो, तो कोई और। मैंने एक बार पंडित जसराज जी की आवाज़ में सुनी थी। उनकी आवाज़ में यह चालीसा एक अलग ही जान पा गई। पिताजी के पुराने टेप रिकॉर्डर पर, बीच-बीच में कैसेट अटकती थी, पिताजी पेंसिल डालकर घुमाते थे। फिर वही आवाज़ — जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
चालीसा का गूढ़ संदेश
पिताजी कहते थे, "बेटा, इस चालीसा का सबसे गूढ़ संदेश यह है — कि तुम अकेले नहीं हो।" जब डर लगे, जब संकट आए, जब लगे कि सब कुछ खत्म हो गया — तब एक नाम काफी है। हनुमान। बस। पिताजी ने मुझे यह सिखाया उस रात, जब मैं 104 डिग्री बुखार में कांप रहा था। और आज, जब मुझे रात को अकेलापन लगता है, तो वही 40 पंक्तियां याद आती हैं। और पिताजी की आवाज़।
अंत में...
पिताजी की एक आदत थी। हर मंगलवार, सुबह-सुबह, वो यह चालीसा पढ़ते थे। मैंने कभी पूछा नहीं क्यों। शायद उन्हें लगता था कि सप्ताह की शुरुआत इससे बेहतर नहीं हो सकती।
आज, जब मैं अपने कमरे में बैठता हूं, रात की चुप्पी में, तो कभी-कभी मेरी आवाज़ निकल जाती है। और फिर लगता है कि पिताजी कहीं पास ही हैं, अपनी कुर्सी पर, आंखें बंद किए, मुस्कुरा रहे हैं।
उस रात जब बुखार था, पिताजी ने यह चालीसा पढ़ा था। मैंने सोचा था कि वो मुझे समझा रहे हैं कि डर मायने नहीं रखता। आज समझ आता है कि वो कुछ और कह रहे थे। वो कह रहे थे कि जब कुछ न बचे, तब एक नाम काफी है। और वो नाम हमेशा साथ रहता है।
हमारा पुराना टेप रिकॉर्डर अब नहीं चलता। लेकिन जब मैं यह चालीसा सुनता हूं, तो वो खरखराहट याद आती है। और पिताजी का हाथ, पेंसिल डालकर कैसेट घुमाते हुए। फिर अचानक वही आवाज़ — जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
