गुरु का शब्द अमोल | संत अचलराम जी का प्रसिद्ध भजन | भावार्थ, शिक्षा, गुरु महिमा और गूढ़ रहस्य

             कोई पच्चीस-तीस साल पुरानी बात होगी। हमारे गाँव के पूरब वाले छोर पर एक पुराना नीम का पेड़ हुआ करता था। हर भादवे की ग्यारस को वहाँ गाँव के पुराने साधु-संत और बुजुर्ग जुटते थे। मंजीरे, खड़ताल और एक पुराने तंबूरे की थाप पर जब रात ढलती, तो भजनों का रंग गाढ़ा होने लगता था। एक बार भोर के समय, जब आसमान में हल्की सी लाली फूट रही थी, हमारे दादाजी के मित्र, संत उतमाराम जी ने तंबूरे के तार को छुआ और बड़ी मद्धम, लेकिन भीतर तक बेधने वाली आवाज़ में गाया—"घड़ से शीश उतार, गुरु जी रे चरणां धरयो..."
उस समय लड़कपन था, तो बात पूरी समझ नहीं आई। लगा कि शीश काटने की बात भला भजन में क्यों हो रही है? लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, संतों की संगति मिली और कबीर-दादू की वाणियों से परिचय हुआ, तब समझ आया कि वहाँ गर्दन काटने की नहीं, बल्कि उस 'अहंकार' को विदा करने की बात हो रही थी जो जनम-जनम से जीव को भटका रहा है। यह भजन केवल गाने की चीज़ नहीं है, यह तो सुरत-शब्द के मार्ग पर चलने वाले किसी साधक के अंतर्मन का जीवंत दस्तावेज़ है।

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भजन का परिचय

यह पद निर्गुण संत परंपरा और विशेषकर राजस्थान की संतमत चेतना का एक अद्भुत रत्न है। इस भजन में एक खोजी साधक की उस अंतिम अवस्था का वर्णन है, जहाँ वह गुरु-ज्ञान के सहारे भवसागर के पार पहुँच जाता है। यह भजन केवल भावुकता का नहीं, बल्कि साधना के उस कड़े मार्ग का है जहाँ बुद्धि की सीमाएँ समाप्त होती हैं और 'अनुभव' का आकाश शुरू होता है।

संत का संक्षिप्त परिचय

भजन की अंतिम पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि इसकी रचना संत अचलराम जी ने की है, जो अपने गुरु सुखराम जी (स्वामी सुखरामदास जी या संप्रदाय विशेष के महापुरुष) की कृपा का गुणगान कर रहे हैं। मारवाड़ और आसपास के अंचलों में ऐसे अनेक विरक्त संत हुए हैं, जिन्होंने लोकभाषा में ब्रह्मज्ञान को ऐसा पिरोया कि वह अनपढ़ ग्रामीणों के कंठ का हार बन गया। यद्यपि इनके ऐतिहासिक जीवन वृत्त के बारे में लिखित जानकारियाँ बहुत सीमित हैं, लेकिन उनकी यह अमर वाणी ही उनके आध्यात्मिक कद को बताने के लिए पर्याप्त है।

भजन पाठ
गुरु का शब्द अमोल, खबर पड़ी जिसने लियो।
तन मन धन कुर्बान, गुरु पे वार दियो॥
घड़ से शीश उतार, गुरु जी रे चरणां धरयो।
अब कुछ धोखो नाय, कारज मेरो सबही सरयो।।
चोंच पंख बिना अंग, पग बिन गमन कियो।
मान सरोवर जाय, हंस विसराम लियो॥
सिंधु ज्यूँ अपार, ब्रह्म निज केवल थयो।
कई हंसारी धाम, पूगों सोई मुक्त भयो॥
निज मोती चुगे हंस, गुरु जी अमर कियो।
जनम मरण नहीं होय, ऐसो गुरु ज्ञान दियो॥
फिर न आऊँ भव मांहि, ब्रह्म में जाय मिल्यो।
गुरु "सुखराम" की मेहर, "अचलराम" मुक्त भयो॥

Hinglish Transliteration

Guru ka shabd amol, khabar padi jisne liyo.
Tan man dhan kurbaan, guru pe vaar diyo.
Ghad se sheesh utaar, guru ji re charna dharayo.
Ab kuch dhokho naay, kaaraj mero sabhi saryo.
Chonch pankh bina ang, pag bin gaman kiyo.
Maan sarovar jaay, hans visraam liyo.
Sindhu jyun apaar, brahm nij keval thayo.
Kai hansaari dhaam, poogo soee mukt bhayo.
Nij moti chuge hans, guru ji amar kiyo.
Janam maran nahi hoy, aiso guru gyaan diyo.
Phir na aaoon bhav maahi, brahm mein jaay milyo.
Guru "Sukhram" ki mehar, "Achalram" mukt bhayo.

सरल हिंदी रूपांतरण

गुरु का शब्द अत्यंत अनमोल है, जिसकी परख या समझ जिसे हो गई, उसने इसे ग्रहण कर लिया। और इसे पाते ही उसने अपना तन, मन और धन सब कुछ गुरु के चरणों में न्योछावर कर दिया।
मैंने अपने धड़ से शीश (अहंकार) को उतारकर गुरुजी के चरणों में रख दिया है। अब मन में कोई संशय, भ्रम या धोखा नहीं रह गया है और मेरा जीवन का मूल कार्य सिद्ध हो गया है।
बिना चोंच, बिना पंख और बिना पैरों के ही उस चेतन स्वरूप ने गति की, और अंतर के मानसरोवर (सहस्रार या शून्य शिखर) में जाकर उस हंसरूपी आत्मा ने विश्राम पा लिया।
वह आत्मा उस अपार सिंधु (परमात्मा) के समान ही शुद्ध, केवल और ब्रह्म रूप हो गई। जो भी साधक उस हंसों के देश (अमर लोक) में पहुँच गया, वह सदा के लिए जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो गया।
वहाँ वह हंस स्वरूप आत्मा अपने निज स्वरूप के मोती चुगती है। गुरुदेव ने उसे अमर कर दिया है। गुरु ने ऐसा दिव्य ज्ञान दिया है कि अब कभी जन्म और मरण का चक्र नहीं होगा।
अब इस संसार रूपी भवसागर में दोबारा लौटकर नहीं आना होगा, क्योंकि यह जीव ब्रह्म में ही विलीन हो गया है। संत अचलराम जी कहते हैं कि मेरे गुरु सुखराम जी की ऐसी असीम कृपा हुई कि यह अचलराम सदा के लिए मुक्त हो गया।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ

गुरु का शब्द अमोल, खबर पड़ी जिसने लियो। 
तन मन धन कुर्बान, गुरु पे वार दियो॥

भावार्थ: सत्संगों में अक्सर इस पंक्ति पर बड़ी गंभीर चर्चा होती है। यहाँ 'खबर पड़ने' का मतलब किसी सांसारिक सूचना से नहीं है। 'खबर पड़ना' यानी अंतर में उस शाश्वत सत्य की चोट लगना, आत्म-बोध होना। गुरु का जो 'शब्द' (दीक्षा या नाम-स्मरण) है, वह बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं है, वह अमूल्य है। जब साधक को उसकी कीमत का अहसास होता है, तो वह संसार के सारे झूठे ठाट-बाठ छोड़ देता है। वह अपना तन, मन और धन सब कुछ उस गुरु-सत्ता को सौंप देता है क्योंकि अब उसे कंकड़-पत्थरों के बदले हीरा मिल गया है।

घड़ से शीश उतार, गुरु जी रे चरणां धरयो। 
अब कुछ धोखो नाय, कारज मेरो सबही सरयो।।

भावार्थ: पहली बार में यह पंक्ति डरावनी लग सकती है, लेकिन संतों की परिभाषा में 'शीश' हमारी खोपड़ी नहीं, बल्कि हमारा 'मैं-पन' यानी अहंकार है। जब तक बुद्धि और तर्क का यह सिर ऊँचा रहेगा, तब तक समर्पण घटित नहीं हो सकता। साधक कहता है कि मैंने अपना तार्किक अहंकार काटकर गुरु के चरणों में रख दिया। जैसे ही यह 'मैं' मरा, वैसे ही सारा भ्रम (धोखो) मिट गया। कबीर साहब भी तो यही कहते थे—शीश काटे भुईं धरे, ता पर राखे पाँव। जब अहंकार ही नहीं बचा, तो माया किसे छलेगी? अब तो जीवन का असली उद्देश्य (कारज) पूरा हो गया।

चोंच पंख बिना अंग, पग बिन गमन कियो। 
मान सरोवर जाय, हंस विसराम लियो॥

भावार्थ: यह उलटबांसी जैसी प्रतीकात्मक शैली है। यहाँ जिस यात्रा की बात हो रही है, वह बाहर की नहीं, भीतर की है। आत्मा के न पैर होते हैं, न पंख, न चोंच। फिर भी वह सुरत (ध्यान) के सहारे मूलाधार से उठकर सुषुम्ना मार्ग से होती हुई शून्य शिखर पर पहुँच जाती है। अंतराकाश में जो 'मानसरोवर' है, वह हृदय या सहस्रार की वह परम शांत अवस्था है जहाँ पहुँचकर यह चंचल मन शांत हो जाता है और जीव 'हंस' बनकर विश्राम पाता है।

सिंधु ज्यूँ अपार, ब्रह्म निज केवल थयो। 
कई हंसारी धाम, पूगों सोई मुक्त भयो॥

भावार्थ: जैसे एक बूंद जब समुद्र में गिरती है, तो वह बूंद नहीं रहती, अपार सिंधु ही बन जाती है। ठीक वैसे ही, साधना की अंतिम अवस्था में आत्मा और परमात्मा का भेद मिट जाता है—ब्रह्म निज केवल थयो। वह शुद्ध चैतन्य हो जाता है। उस 'हंसों के धाम' (सत्यलोक या आत्म-पद) में जो भी आत्मा पहुँच जाती है, वह संसार के द्वंद्वों से मुक्त हो जाती है।

निज मोती चुगे हंस, गुरु जी अमर किया। 
जनम मरण नहीं होय, ऐसो गुरु ज्ञान दियो॥

भावार्थ: संसारी जीव वासनाओं के कंकड़-पत्थर चुगता है, लेकिन जो साधक अंतर्मुखी होकर हंस बन गया है, वह केवल 'निज मोती' यानी स्वरूप-आनंद और राम-नाम का रस चुगता है। गुरु के इस ज्ञान ने काल के पंजे से छुड़ाकर जीव को अमर कर दिया है। अब चौरासी लाख योनियों का चक्कर सदा के लिए समाप्त हो गया।

फिर न आऊँ भव मांहि, ब्रह्म में जाय मिल्यो। 
गुरु "सुखराम" की मेहर, "अचलराम" मुक्त भयो॥

भावार्थ: यह इस आध्यात्मिक यात्रा का अंतिम पड़ाव है। नदियाँ जब तक सागर में नहीं मिलतीं, तब तक उनका बहना और भटकना जारी रहता है। यहाँ अचलराम जी घोषणा करते हैं कि अब इस संसार-चक्र में दोबारा आना नहीं होगा, क्योंकि अंश अपने अंशी (ब्रह्म) में समा गया है। और यह सब किसी बुद्धि या बल से नहीं हुआ, यह तो केवल गुरु सुखराम जी की 'मेहर' यानी असीम कृपा का प्रतिफल है।

भजन का गहन आध्यात्मिक विश्लेषण


संतमत और सुरत-शब्द योग की दृष्टि से अर्थ

इस भजन की गहराई को समझने के लिए हमें संतमत के 'सुरत-शब्द योग' को समझना होगा। संतमत मानता है कि परमात्मा शब्द-स्वरूप है और हमारी चेतना (सुरत) उस शब्द की डोर पकड़कर ही वापस अपने घर लौट सकती है। भजन की तीसरी पंक्ति—"पग बिन गमन कियो"—इसी आंतरिक यात्रा का संकेत करती है। हठयोग में जहाँ प्राणायाम और चक्र-भेदन की कठिन क्रियाएँ हैं, वहीं संतमत में गुरु के दिए 'शब्द' के सहारे बिना किसी शारीरिक हलचल के, ध्यान के माध्यम से अंतर की यात्रा तय की जाती है।

प्रतीकों और शब्दों का रहस्य

 * शीश: यह केवल मस्तक नहीं है। यह हमारी 'मति' है, हमारा संसारी सयानापन है। गुरु के सम्मुख जब तक हम अपनी अक्ल का विसर्जन नहीं करते, तब तक उनका अमर शब्द हमारे भीतर प्रवेश नहीं कर सकता।
 * हंस: हंस नीर-क्षीर विवेक का प्रतीक है, जो दूध और पानी को अलग कर देता है। संसारी अवस्था में जीव 'कागा' (कौआ) होता है जो गंदगी ढूंढता है, लेकिन गुरु की कृपा से वह विवेकी 'हंस' बन जाता है।
 * मानसरोवर: यह किसी भौगोलिक स्थान का नाम नहीं है। हमारे भीतर जो भृकुटी के पार का शून्य आकाश है, जहाँ अमृत की धार बहती है, संत उसी को अंतर का मानसरोवर कहते हैं।

मन के भीतर उठती एक अनुभूति

इस भजन को पढ़ते-पढ़ते कई बार ऐसा लगता है जैसे संत अचलराम जी किसी सभा में खड़े होकर उपदेश नहीं दे रहे, बल्कि अपनी भीतर की यात्रा का वृत्तांत सुना रहे हैं। वे यह नहीं कह रहे कि "तुम ऐसा करो" या "तुम्हें वैसा करना चाहिए"। वे तो बस अपनी आँखों से देखी हुई बात कह रहे हैं।
कभी-कभी सोचता हूँ कि "गुरु का शब्द अमोल" का अर्थ शायद तभी समझ में आता है जब जीवन की बहुत-सी चीज़ें अपनी चमक खोने लगती हैं। जब मन बार-बार बाहर दौड़कर लौट आता है और फिर भी तृप्त नहीं होता। तब संतों की वाणी के ये शब्द किसी पुराने परिचित की तरह सामने आ खड़े होते हैं।
"घड़ से शीश उतार" वाली पंक्ति पर जितना मनन करता हूँ, उतना ही लगता है कि यह साधना का सबसे कठिन पड़ाव है। संसार छोड़ना शायद उतना कठिन नहीं, जितना अपने बारे में बनी धारणाओं को छोड़ना। हम सब अपने भीतर एक छोटा-सा सिंहासन बनाकर बैठे हैं, जहाँ हमारा अहंकार चुपचाप राज करता रहता है। संत उसी सिंहासन को खाली करने की बात करते हैं।

और फिर "हंस विसराम लियो"...

इस पंक्ति में न जाने कैसी शांति छिपी हुई है। कभी भोर के समय, जब चारों ओर सन्नाटा होता है और पक्षियों की पहली आवाज़ भी पूरी तरह नहीं फूटी होती, तब यह पंक्ति याद आती है। लगता है जैसे संत किसी दूर देश की नहीं, मन की उसी अवस्था की बात कर रहे हैं जहाँ पहुँचकर भागदौड़ समाप्त हो जाती है। जहाँ कुछ सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती, कुछ पाने की बेचैनी नहीं रहती।

एक व्यक्तिगत चिंतन

जब भी इस भजन को पढ़ता हूँ, अनायास ही बचपन की वे सत्संग वाली रातें याद आने लगती हैं। मिट्टी की सौंधी गंध, लालटेन की हल्की रोशनी, बुजुर्गों के झुर्रियों भरे चेहरे, और तंबूरे की वह लंबी खिंचती हुई तान...
तब इन शब्दों का अर्थ नहीं समझता था, लेकिन उनकी ध्वनि भीतर कहीं उतर जाती थी।
आज अर्थ थोड़ा-थोड़ा समझ में आने लगा है, पर कभी-कभी लगता है कि शायद तब सुनना अधिक सच्चा था और आज समझना अधिक जटिल हो गया है।
क्योंकि संतों की वाणी का रहस्य केवल अर्थ में नहीं, उस मौन में भी छिपा होता है जो शब्दों के बीच ठहरता है।

"गुरु 'सुखराम' की मेहर, 'अचलराम' मुक्त भयो"

इस भजन की अंतिम पंक्ति पर पहुँचकर मन ठहर जाता है।
अचलराम जी ने कहीं भी अपने तप, अपने ज्ञान, अपनी साधना या अपनी योग्यता का बखान नहीं किया। पूरी यात्रा का श्रेय अंत में गुरु की मेहर को दे दिया। शायद यही संतों की पहचान है। जहाँ हम अपनी उपलब्धियों की गिनती करते हैं, वहाँ वे अपनी कृपा की कहानी सुनाते हैं।

कभी-कभी देर रात इस भजन को मन ही मन दोहराते हुए एक प्रश्न भीतर उठता है—

क्या वास्तव में मैंने भी उस "अमोल शब्द" की खबर पाई है, या अभी तक केवल उसके बारे में सुन ही रहा हूँ?

इस प्रश्न का उत्तर मेरे पास नहीं है।
शायद यही अच्छा है।
क्योंकि कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर शब्दों में नहीं मिलता; वे केवल साधना, प्रतीक्षा और कृपा के रास्ते खुलते हैं।
और संभव है कि संत अचलराम जी का यह भजन भी हमें कोई अंतिम उत्तर देने नहीं, बल्कि इसी प्रश्न के साथ भीतर की ओर भेजने आया हो।

"घड़ से शीश उतार, गुरु जी रे चरणां धरयो..."

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