Guru Kripa Prarthana | करुणासिंधु गुरुदेव कृपा करि दीजै ज्ञान | Guru Purnima Special Prayer, Bhavarth & Manan

 ।।गुरु कृपा प्रार्थना।।

करुणासिंधु गुरुदेव कृपा करि दीजै ज्ञान।

मोह अंधेरा दूर कर, दीजै आत्म पहिचान॥

।। Guru Kripa Prarthana ।।

Karunasindhu Gurudev kripa kari deejai gyaan।

Moh andhera door kar, deejai aatma pahichaan॥


पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ

"करुणासिंधु गुरुदेव कृपा करि दीजै ज्ञान।"

शब्दार्थ:

हे गुरुदेव! आप करुणा और दया के अथाह सागर हैं। कृपा करके मुझे ज्ञान प्रदान कीजिए।

Guru Kripa Prarthana, Guru Purnima, Guru Mahima, Guru Bhakti, Guru Kripa


संतमत की दृष्टि से

इस पंक्ति में शिष्य अपने गुरु को "करुणासिंधु" कहकर पुकारता है। यह केवल सम्मान का शब्द नहीं है, बल्कि गुरु के वास्तविक स्वरूप का संकेत भी है। संत परंपरा में गुरु वह है जो जीव की अज्ञानता को देखकर उससे विमुख नहीं होता, बल्कि करुणा के साथ उसे सत्य की ओर ले जाता है।

यहाँ "ज्ञान" का अर्थ सामान्य जानकारी, शास्त्रों का अध्ययन या तर्क-वितर्क से प्राप्त बुद्धि नहीं है। संतों की वाणी में ज्ञान का अर्थ है—अपने वास्तविक स्वरूप का बोध। कबीर, गुरु नानक, दादूदयाल और रैदास जैसे संत बार-बार बताते हैं कि मनुष्य संसार को तो बहुत जानता है, पर स्वयं को नहीं जानता। गुरु उसी विस्मृत सत्य का स्मरण कराते हैं।

इसलिए शिष्य गुरु से धन, यश, पद या सांसारिक सुविधा नहीं माँगता। वह ज्ञान माँगता है, क्योंकि वही जीवन की दिशा बदल सकता है। संतमत में साधना आवश्यक है, परंतु साधना का फल तब परिपक्व होता है जब उस पर गुरु-कृपा की वर्षा होती है। गुरु-कृपा उस दीपक के समान है जो साधक के भीतर पहले से विद्यमान सत्य को प्रकाशित कर देती है।


"मोह अंधेरा दूर कर, दीजै आत्म पहिचान॥"

शब्दार्थ:

मेरे भीतर के मोह रूपी अंधकार को दूर करके मुझे आत्मा की पहचान कराइए।


संतमत की दृष्टि से

संत साहित्य में "मोह" केवल किसी व्यक्ति, वस्तु या संबंध के प्रति लगाव नहीं है। मोह वह स्थिति है जिसमें मनुष्य अस्थायी को स्थायी और नश्वर को शाश्वत समझ बैठता है। शरीर, नाम, पद, प्रतिष्ठा, धन और संबंध—इन सबको ही अपना अंतिम सत्य मान लेना मोह है।

इसीलिए इस पंक्ति में मोह को "अंधेरा" कहा गया है। अंधेरे में वस्तुएँ मौजूद तो रहती हैं, पर उनका वास्तविक स्वरूप दिखाई नहीं देता। उसी प्रकार मोह और अज्ञान से घिरा मनुष्य संसार में रहते हुए भी स्वयं को ठीक से नहीं पहचान पाता।

शिष्य गुरु से प्रार्थना करता है कि इस भ्रम और अज्ञान के अंधकार को दूर करें तथा आत्म-पहिचान प्रदान करें। आत्म-पहिचान का अर्थ केवल स्वयं के गुण-दोष जान लेना नहीं है। संतमत में इसका अर्थ है अपने भीतर स्थित उस चेतन सत्ता का अनुभव करना जो शरीर, मन और अहंकार से परे है।

संतों की दृष्टि में आध्यात्मिक यात्रा का वास्तविक आरंभ यहीं से होता है। जब मनुष्य अपने बारे में बनी हुई सीमित धारणाओं से आगे बढ़ता है, तब उसके भीतर एक नई दृष्टि जन्म लेती है। संसार वही रहता है, परिस्थितियाँ वही रहती हैं, लेकिन उन्हें देखने का नजरिया बदल जाता है।


पद का भावार्थ

यह छोटी-सी प्रार्थना अपने भीतर गुरु-शिष्य परंपरा का गहरा सार समेटे हुए है। शिष्य गुरु के सामने बैठकर किसी बाहरी उपलब्धि की याचना नहीं करता। वह न धन चाहता है, न सम्मान, न सुख-सुविधाएँ। उसकी एकमात्र विनती है कि गुरु अपनी कृपा से ऐसा ज्ञान प्रदान करें जिससे जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझ में आ सके।

संत परंपरा बार-बार बताती है कि मनुष्य का सबसे बड़ा बंधन बाहर नहीं, भीतर है। माया, मोह और अहंकार मन पर ऐसा आवरण डाल देते हैं कि जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है। वह स्वयं को केवल शरीर, नाम और सामाजिक पहचान तक सीमित मानने लगता है।

गुरु की कृपा इस विस्मृति को तोड़ती है। गुरु कोई नया सत्य नहीं बनाते, बल्कि उस सत्य का परिचय कराते हैं जो पहले से ही हमारे भीतर विद्यमान है। इसी कारण संतों ने गुरु को मार्गदर्शक ही नहीं, बल्कि आत्मबोध का द्वार कहा है।

इस प्रार्थना में "ज्ञान" और "आत्म-पहिचान" एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। गुरु-कृपा से विवेक जागता है। तब धीरे-धीरे मोह की पकड़ ढीली पड़ने लगती है और आत्म-बोध का प्रकाश स्वयं प्रकट होने लगता है।" यही संतमत की साधना का मूल उद्देश्य है।


संत-दर्शन की एक झलक

संतों की वाणी में बार-बार एक बात सुनाई देती है—मनुष्य बाहर बहुत खोजता है, पर भीतर झाँकना भूल जाता है। वह तीर्थों, ग्रंथों और संसार के अनुभवों में सत्य को खोजता है, जबकि संत उसे अपने ही अंतर्मन की ओर लौटने का संकेत देते हैं।

गुरु का कार्य इसी दिशा को बदलना है। गुरु शिष्य को कोई नया संसार नहीं देते; वे उसकी दृष्टि को नया बना देते हैं। जैसे दर्पण चेहरा नहीं बनाता, केवल दिखाता है, वैसे ही गुरु आत्मा का परिचय कराते हैं। इसीलिए संत परंपरा में गुरु-कृपा को आध्यात्मिक जीवन का सबसे बड़ा आधार माना गया है।

संतों की वाणी पढ़ते समय अक्सर लगता है कि वे हमें कोई नई बात नहीं बता रहे, बल्कि वही याद दिला रहे हैं जिसे हम जीवन की भागदौड़ में भूल चुके हैं।


मनन

यह प्रार्थना केवल दो पंक्तियों की है, लेकिन यदि मन लगाकर पढ़ी जाए तो एक पूरी साधना-दृष्टि को सामने रख देती है।

हम अक्सर जीवन की समस्याओं, इच्छाओं और उपलब्धियों में इतने व्यस्त रहते हैं कि अपने भीतर झाँकने का समय ही नहीं निकाल पाते। लेकिन जिस दिन मनुष्य को यह अनुभव होने लगता है कि वह स्वयं को पूरी तरह नहीं जानता, उसी दिन उसकी आध्यात्मिक यात्रा का वास्तविक आरंभ होता है।

"आत्म पहिचान" की प्रार्थना किसी नई वस्तु को पाने की माँग नहीं है। यह उस सत्य को देखने की विनती है जो पहले से ही हमारे भीतर उपस्थित है, पर मोह, आदतों और अहंकार की धूल से ढका हुआ है। गुरु-कृपा का चमत्कार यही है कि वह बाहर से कुछ जोड़ती नहीं, बल्कि भीतर छिपे प्रकाश को प्रकट कर देती है।

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने