सद्गुरु प्रार्थना | अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारणम् अर्थ, गुरु महिमा, गुरु कृपा और Guru Purnima विशेष

 ।।सद्गुरु प्रार्थना।।

अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारणम्।

ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं गुरुपादोदकं पिबेत्॥

।। Sadguru Prarthana ।।

Agyaan-mool-haranam janma-karma-nivaaranam।

Gyaan-vairaagya-siddhyartham Guru-paadodakam pibet॥

अज्ञानमूलहरणं — यहाँ 'अज्ञान' केवल बाहरी ज्ञान की कमी नहीं, वह भूल है जिसमें आत्मा अपने को देह मान बैठी है। संतमत में इसे 'मूल अज्ञान' कहते हैं — जड़ में लगी वह भ्रांति जो जन्म-मृत्यु के चक्र को चलाती है। कबीर साहब कहते थे, 'जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं' — यही अज्ञान की छाया टूटने का वर्णन है। गुरु इस मूल को हरते हैं, सत्संग की आग से इसे जलाते हैं।

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जन्मकर्मनिवारणम्जन्म और कर्म का बंधन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कर्म करते रहो, फल चाहते रहो, और फल की इच्छा नई कर्म की जननी बनती है — यही चक्र है। गुरु यहाँ केवल 'अच्छे कर्म' सिखाने नहीं आते; वे कर्म के पीछे दौड़ने वाले 'मोह' को ही तोड़ देते हैं। दादू दयाल जी की बानी में आता है — 'कर्म-कांड से छूटकर, नाम में लीन हो जा।' यह निवारण भागने में नहीं, समझ में है।

ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थंज्ञान और वैराग्य, ये दोनों साथ चलते हैं। एक बिना दूसरा अधूरा। ज्ञान बिना वैराग्य का तो केवल बुद्धि का खेल है, और वैराग्य बिना ज्ञान का उदासीनता मात्र। गुरु-कृपा से यह सिद्धि होती है — वह क्षण जब सूरत (ध्यान) अपने मूल में लगती है, और माया का रंग फीका पड़ जाता है। यह कोई क्रोध से या थकान से नहीं, अपने-आप होता है — जैसे सूर्य उगते ही अंधेरा हट जाता है।

गुरुपादोदकं पिबेत् — 'पादोदक' शब्द में गहराई है। यह केवल चरणामृत नहीं, गुरु के चरणों में बहने वाली वह धारा है जो शिष्य के भीतर उतरती है। पीना यहाँ भौतिक क्रिया नहीं, अंतर का समर्पण है। गुरु नानक देव जी की बानी में 'गुरु का शब्द' ही जल है, जो प्यासे को तृप्त करता है। यह पाना साधना नहीं, गुरु-कृपा की अनुभूति है — जब शिष्य का दिल इतना खाली हो कि गुरु का प्रकाश उसमें ठहर सके।

चिंतन — यह श्लोक मुझे उस किसान की याद दिलाता है जो बारिश के इंतजार में खेत तैयार रखता है। हम सब खेत हैं, और गुरु-कृपा वह बादल जो अपने समय पर बरसता है। पर खेत पत्थर का नहीं, मिट्टी का होना चाहिए। साधना यही मिट्टी को नरम करना है। कभी-कभी लगता है कि बहुत देर हो गई, पर संत-साहित्य में 'देर' शब्द का कोई अर्थ नहीं — आत्मा काल से परे है। बस, एक बार सच्चे मन से गुरु के चरणों में झुक जाओ, फिर देखो कि कैसे जीवन अपने आप एक नए सुर में बहने लगता है। यह कोई उपदेश नहीं, बस एक भाई की तरह कह रहा हूँ — जो रास्ते पर मिला, उसने भी यही अनुभव किया है।

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